01शारदा देश कश्मीर
कश्मीर को शारदा देश कहा जाता था, और हर कश्मीरी पण्डित बालक कभी "नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुरवासिनि" के वन्दन से पढ़ाई आरम्भ करता था। कल्हण राजतरंगिणी में शारदा के देवालय का नाम लेते हैं, और लगभग 1030 ई. में लिखने वाले अल-बिरूनी कश्मीर की शारदा की पूज्य काष्ठ-प्रतिमा को जानते थे। माधवीय शंकर दिग्विजय बताता है कि आदि शंकराचार्य यहाँ आए और चारों द्वारों के विद्वानों को उत्तर देकर सर्वज्ञ पीठ पर आसीन हुए। शारदा लिपि, जिसमें कश्मीर ने हज़ार वर्ष लिखा, देवी के नाम पर है।
02विनाश और विच्छेद
लम्बे सल्तनत काल में पीठ की नियमित पूजा छूट गई, और ऊँचे चबूतरे पर सीढ़ियों से जुड़ा, दीवारों से घिरा पाषाण देवालय उन्नीसवीं शताब्दी तक खण्डहर हो चुका था। 1947 से यह पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में है, और 2005 के भूकम्प ने इसे और क्षति पहुँचाई। कश्मीरी पण्डित लम्बे समय से यहाँ तक गलियारे की माँग करते आए हैं। मार्च 2023 में किशनगंगा के भारतीय तट पर कुपवाड़ा के टीटवाल में माता शारदा का नया मन्दिर खुला, पुराने पीठ से पहले के अन्तिम पड़ाव के रूप में।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 1030 ई.अल-बिरूनी कश्मीर में पूजित शारदा प्रतिमा का उल्लेख करते हैं।
- 1947 ई.1947 के आक्रमण के बाद पीठ पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में चला गया।
- 2005 ई.कश्मीर भूकम्प से खण्डहरों को और क्षति।
- मार्च 2023भारतीय तट पर टीटवाल में माता शारदा का नया मन्दिर खुला।
पुराना पीठ भारत से नहीं जाया जा सकता। कुपवाड़ा ज़िले का टीटवाल मन्दिर स्थानीय अनुमति के साथ यात्रियों के लिए खुला है।




