पुनर्निर्मित

श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर

अकाल पुरख का सिंहासन, जो पुल के उस पार हरमन्दिर साहिब के सामने है। 1606 में गुरु हरगोबिन्द ने इसे सिखों की सांसारिक सत्ता के आसन के रूप में खड़ा किया। यह पाँच तख़्तों में पहला है और इसके हुक्मनामे पूरे पन्थ पर लागू होते हैं।

निर्माण: 1606, गुरु हरगोबिन्द; महाराजा रणजीत सिंह के समय पाँच मंज़िला; 1986–95 में कार सेवा से पुनर्निर्मितस्थान: पंजाब (अमृतसर)31.62° N, 74.88° E
  1. 1606 ई.
  2. 1762 ई.
  3. 1774 ई.
  4. 3–8 जून 1984
  5. 26 जनवरी 1986
  6. 1995 ई.
चित्र: Jasleen Kaur · CC BY-SA 2.0
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“श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/places/akal-takht/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/places/akal-takht/

01दो तलवारें

1606 में जहाँगीर के आदेश पर लाहौर में गुरु अर्जन देव को मृत्युदण्ड दिया गया। उनके पुत्र गुरु हरगोबिन्द ने, जो तब ग्यारह वर्ष के थे, गद्दी पर बैठते समय दो तलवारें धारण कीं, एक मीरी की, यानी सांसारिक शक्ति की, और एक पीरी की, यानी आध्यात्मिक सत्ता की। सिख परम्परा के अनुसार उसी वर्ष उन्होंने हरमन्दिर के सामने एक ऊँचा चबूतरा बनवाया, जिसका काम बाबा बुड्ढा और भाई गुरदास ने किया। हरमन्दिर कीर्तन और अरदास के लिए था; इस चबूतरे से गुरु विवाद सुनते, भेंट में घोड़े और शस्त्र लेते, और कुश्ती तथा अपने योद्धाओं का अभ्यास देखते थे। इसे अकाल बुंगा, अकाल का घर, कहा गया।

02अठारहवीं शताब्दी का सरबत ख़ालसा

बन्दा सिंह बहादुर के बाद के कठिन दशकों में सिख मिसलें वैसाखी और दीवाली पर अकाल बुंगा पर मिलतीं, सरबत ख़ालसा के रूप में बैठतीं और गुरु ग्रन्थ साहिब की हज़ूरी में ‘गुरमते’, यानी सामूहिक निर्णय, पारित करतीं। अफ़ग़ान बादशाह अहमद शाह अब्दाली एक से अधिक बार इस स्थान पर चढ़ आया; फ़रवरी 1762 के वड्डा घल्लूघारा, भीषण नरसंहार, के बाद उसने हरमन्दिर को बारूद से उड़ाया और सरोवर को पटवा दिया। सिख हर बार लौट आए। 1774 में जस्सा सिंह आहलूवालिया के समय तख़्त की पहली मंज़िल ईंटों से बनी। महाराजा रणजीत सिंह के राज में यह पाँच मंज़िला हुआ, और उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में इसके कक्ष भित्तिचित्रों से भरे गए। हर रात गुरु ग्रन्थ साहिब को विश्राम के लिए यहीं लाया जाता है।

03जून 1984 और उसके बाद

1983 में प्रचारक जरनैल सिंह भिण्डराँवाले अपने सशस्त्र साथियों के साथ दरबार साहिब परिसर में आ बसे और अकाल तख़्त की मोर्चाबन्दी कर ली। 3 से 8 जून 1984 के बीच इन्दिरा गांधी की सरकार के आदेश पर भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार में परिसर पर धावा बोला; लड़ाई में बहुत लोग मारे गए, जिनमें तीर्थयात्री भी थे, और टैंकों की गोलाबारी से अकाल तख़्त ढह गया। सरकार ने बाबा सन्ता सिंह के द्वारा कुछ ही सप्ताह में इमारत फिर खड़ी करा दी, पर सिख संगत ने उसे स्वीकार नहीं किया। 26 जनवरी 1986 को वह ढाँचा गिरा दिया गया और कार सेवा, यानी स्वैच्छिक श्रमदान, से नया अकाल तख़्त बना, जो 1995 में पूरा हुआ। पुराने भित्तिचित्र नष्ट हो गए।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1606 ई.गुरु हरगोबिन्द ने हरमन्दिर के सामने अकाल बुंगा का चबूतरा बनवाया।
  2. 1762 ई.वड्डा घल्लूघारा के बाद अहमद शाह अब्दाली ने हरमन्दिर को उड़ाया।
  3. 1774 ई.जस्सा सिंह आहलूवालिया के समय तख़्त की पहली मंज़िल ईंटों से फिर बनी।
  4. 3–8 जून 1984ऑपरेशन ब्लू स्टार में अकाल तख़्त बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ।
  5. 26 जनवरी 1986सरकार का बनवाया ढाँचा गिराया गया और नए तख़्त की कार सेवा शुरू हुई।
  6. 1995 ई.पुनर्निर्मित अकाल तख़्त पूरा हुआ।
दर्शन और यात्रा

अमृतसर में दरबार साहिब परिसर के भीतर; सिर ढककर और जूते द्वार पर छोड़कर जाएँ। सुखासन की अरदास के बाद रात को गुरु ग्रन्थ साहिब की पालकी यहाँ पहुँचती है।