अब्दाली ने कूच करते सिख दल को घेरकर हज़ारों को मार डाला, जिनमें अधिकांश लड़ने वाले नहीं थे; ख़ालसा की लड़ाकू शक्ति बची रही और कुछ महीनों में फिर मैदान में थी।
01अब्दाली का तेज़ कूच
पानीपत के बाद पंजाब में सिख मिसलें शक्तिशाली हुईं, अब्दाली के सूबेदारों को घेरने और उसके नगर लेने लगीं। 1762 के आरम्भ में अपने छठे आक्रमण में अब्दाली को पता चला कि सिखों का बड़ा समूह, योद्धा अपनी स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों के साथ, मलेरकोटला क्षेत्र से होकर बरनाला के पास की सूखी भूमि की सुरक्षा की ओर जा रहा है। वह अपने सबसे अच्छे घुड़सवारों के साथ लाहौर से निकला, सतलुज पार कर लगभग दो दिन में दूरी तय की, और सरहिंद के सूबेदार ज़ैन ख़ाँ तथा मलेरकोटला की सेना से जा मिला। 5 फ़रवरी 1762 की भोर में उन्होंने कुप और रहीड़ा गाँवों के पास इस दल को घेर लिया।
02चलती हुई दीवार
सिख योद्धाओं ने परिवारों के चारों ओर घेरा बनाया और उन्हें दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ाते रहे; जहाँ भी अफ़ग़ान घुसते, मुड़कर धावा बोलते। उस दिन की स्मृति सँजोने वाले प्राचीन पंथ प्रकाश में रतन सिंह भंगू लिखते हैं कि जस्सा सिंह आहलूवालिया को बीस से अधिक घाव लगे और चड़त सिंह पीछे का मोर्चा सँभाले रहे। घेरा कई जगह टूटा और परिवारों में भयानक संहार हुआ। कोई गिनती नहीं रखी गई; इतिहासकार मृतकों को हज़ारों में, लगभग दस से तीस हज़ार के बीच, आँकते हैं। दो महीने बाद अब्दाली ने अमृतसर में हरमंदिर साहिब को उड़ा दिया। उसी अक्टूबर सिख अमृतसर में फिर उससे लड़े, जनवरी 1764 में सरहिंद लिया, और हरमंदिर को फिर से बनाया।
वड्डा घल्लूघारा सिख इतिहास का सबसे अँधेरा दिन है और उसके टिके रहने का प्रमाण भी: इसके तीन वर्ष के भीतर ख़ालसा लाहौर और पंजाब के मैदानों पर राज कर रहा था।
