मुग़ल सेना हारी और मुख़लिस ख़ाँ मारा गया।
01मीरी और पीरी
1606 में अपने पिता गुरु अर्जन देव जी के बलिदान के बाद गुरु हरगोबिन्द जी ने दो तलवारें धारण कीं, एक मीरी (सांसारिक सत्ता) की और एक पीरी (आध्यात्मिक सत्ता) की। उन्होंने हरमन्दिर साहिब के सामने अकाल तख़्त बनवाया और सशस्त्र सिख तथा घोड़े रखे। जब मुग़ल सेना अमृतसर आई, सिखों ने नगर के बाहर उसका सामना कर उसे खदेड़ दिया; सेनानायक मुख़लिस ख़ाँ लड़ाई में मारा गया।
02आगे क्या हुआ
आगे के कुछ वर्षों में गुरु जी ने हरगोबिन्दपुर, गुरुसर और करतारपुर में मुग़ल सेनाओं से तीन और युद्ध लड़े, फिर शिवालिक की पहाड़ियों में कीरतपुर में निवास किया। अमृतसर की लड़ाई का ठीक वर्ष सिख स्रोतों में अलग-अलग मिलता है; अधिकांश आधुनिक इतिहास 1634 बताते हैं। सिखों को जानने वाले एक समकालीन द्वारा लिखा ‘दबिस्तान-ए-मज़ाहिब’ गुरु जी के सैनिकों और मुग़ल अधिकारियों से उनके युद्धों का उल्लेख करता है।
सिख सशस्त्र प्रतिरोध का आरम्भ, जिसे गुरु गोबिन्द सिंह जी और बन्दा सिंह बहादुर ने बहुत आगे बढ़ाया।
