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“धनतेरस (धनत्रयोदशी).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/utsav/dhanteras/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). धनतेरस (धनत्रयोदशी). प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/utsav/dhanteras/
कैसे मनाते हैं
- 01
पीतल, ताँबे या स्टील का नया बरतन, या सोने-चाँदी का सिक्का ख़रीदना
- 02
वैद्यों और आयुर्वेदी परिवारों द्वारा धन्वन्तरि पूजा
- 03
यमदीप: संध्या को दक्षिणमुखी चौमुखा दीप द्वार के बाहर
- 04
आने वाले लक्ष्मी पूजन के लिए घर की सफ़ाई और रोशनी
01धन्वन्तरि और अमृत
भागवत पुराण के आठवें स्कन्ध में कथा है कि देवताओं और असुरों ने मन्दराचल की मथानी और वासुकि की रस्सी से क्षीरसागर मथा। सबसे अन्त में धन्वन्तरि प्रकट हुए, श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, हाथ में अमृत से भरा कलश। पुराण उन्हें विष्णु के अवतारों में गिनता है और आयुर्वेद का प्रवर्तक कहता है। वैद्य इस त्रयोदशी को उनकी पूजा करते हैं, और 2016 से भारत सरकार इस दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाती है।
02यम का दीपदान
संध्या को आटे या मिट्टी का चौमुखा दीप द्वार के बाहर रखा जाता है, लौ दक्षिण की ओर, जो यम की दिशा है। घरों में राजा हिम के पुत्र की कथा सुनाई जाती है, जिसकी मृत्यु विवाह की चौथी रात सर्पदंश से लिखी थी। उसकी पत्नी ने द्वार पर गहने और सिक्के ढेर कर दिए, चारों ओर दीप जलाए और रात भर गाती रही; सर्प बनकर आए यम उस चमक से चौंधियाकर भोर होते लौट गए। इसीलिए सोना, नया बरतन और यमदीप।
उत्तर और पश्चिम भारत, गुजरात, महाराष्ट्र; आयुर्वेद के वैद्य इसे हर जगह धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में मानते हैं
