नाट्यशास्त्रम्

नाट्यशास्त्र

भरत मुनि के नाम से चला आया नाट्य, नृत्य और संगीत का शास्त्र। भारत का हर शास्त्रीय नृत्य और रस का हर सिद्धान्त इसी तक लौटता है।

चित्र: Jagajjyoti Malla · Public domain
कला
नाट्य
तिथि
प्राचीन; अभिनवगुप्त की टीका लगभग 1000 ई.
क्षेत्र
सम्पूर्ण भारत
युग
शुंग, सातवाहन, खारवेल और संगम राज्य
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“नाट्यशास्त्र.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/natya-shastra/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). नाट्यशास्त्र. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/natya-shastra/

इसकी पहचान

  1. 01

    रस-सूत्र: विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव

  2. 02

    चार अभिनय: आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक

  3. 03

    नृत्य के 108 करण

  4. 04

    नाट्यमंडप के निर्माण के नियम

  5. 05

    स्वर, श्रुति और अवनद्ध वाद्य का सिद्धान्त

01पंचम वेद

पहला अध्याय बताता है कि देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से ऐसी विद्या माँगी जिसे सब देख-सुन सकें, क्योंकि चारों वेद सबके लिए खुले नहीं थे। ब्रह्मा ने नाट्यवेद रचा: ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर। यह विद्या उन्होंने भरत को दी, जिन्होंने अपने सौ पुत्रों के साथ पहला नाटक खेला। ग्रन्थ लगभग 36 अध्यायों और करीब 6,000 श्लोकों का है, जिसमें रंगमंडप, अभिनेता, मुद्रा, वेशभूषा, छन्द, संगीत और मृदंग तक सब आता है।

02रस और 108 करण

छठे अध्याय में वह सूत्र है जिसे हर रसिक जानता है: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। भरत आठ रस गिनाते हैं, शृंगार से अद्भुत तक। कश्मीर के अभिनवगुप्त ने लगभग 1000 ई. में अभिनवभारती टीका लिखकर शान्त को नौवाँ रस सिद्ध किया। चौथे अध्याय में नृत्य की 108 इकाइयाँ, करण, गिनाए गए हैं। राजराज चोल ने तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के ऊपरी गलियारे में इनमें से 81 करण उकेरवाए, और चिदम्बरम के गोपुरों पर पूरा क्रम श्लोकों सहित अंकित है।

03आज यह ग्रन्थ

इसकी पाण्डुलिपियाँ केरल, नेपाल और अन्य स्थानों पर बची हैं। काशी संस्कृत सीरीज़ और गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज़ ने इसे छापा; दूसरी में एम. रामकृष्ण कवि ने अभिनवगुप्त की टीका का सम्पादन किया। अप्रैल 2025 में यूनेस्को ने नाट्यशास्त्र की पाण्डुलिपियों को, भगवद्गीता के साथ, ‘मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड’ रजिस्टर में स्थान दिया। भरतनाट्यम, ओडिसी और कुचिपुड़ी का हर विद्यार्थी आज भी इसके हस्त सीखता है।

महान आचार्य और कलाकार

भरत मुनिअभिनवगुप्त (अभिनवभारती)नन्दिकेश्वर (अभिनयदर्पण)

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