नरगुंद का घेरा (1785)

नरगुंद, मराठों के अधीन जागीरवेंकटराव भावे
1785 ई.बनाम
विजेतामैसूर राज्यबुरहानुद्दीन, टीपू सुल्तान की ओर से

नरगुंद की छोटी ब्राह्मण रियासत मन से पुणे के साथ थी और उसने टीपू की बढ़ी हुई खंडणी की माँग ठुकरा दी। टीपू के दामाद ने उसके सरदार को पहाड़ी दुर्ग में घेरकर भूख से झुकने पर विवश किया, और इसी प्रसंग से 1785–87 का मराठा-मैसूर युद्ध भड़का।

तिथि: फ़रवरी–जुलाई 1785 ई.स्थान: नरगुंद दुर्ग, गदग ज़िला, कर्नाटकप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Unknown author · Public domain
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“नरगुंद का घेरा (1785).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-nargund-1785/. देखा गया .

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परिणाम

लगभग पाँच महीने की घेराबंदी के बाद वेंकटराव ने समर्पण किया और नरगुंद फिर मैसूर के अधीन चला गया।

01पुणे की ओर देखती जागीर

नरगुंद गदग के उत्तर में, मलप्रभा और तुंगभद्रा के बीच एक नंगी पहाड़ी पर बसा है। 1778 में हैदर अली ने इसे जीतकर भावे सरदार को खंडणी देने वाले जागीरदार के रूप में बने रहने दिया था। पिता की मृत्यु के बाद जब टीपू ने खंडणी बढ़ाई, तो वेंकटराव भावे ने मना कर दिया और नाना फड़नवीस को सहायता के लिए लिखा। पुणे ने टीपू से विरोध जताया। टीपू ने उत्तर में अपने दामाद बुरहानुद्दीन को सेना देकर भेज दिया।

02घेराबंदी और उसके बाद

फ़रवरी 1785 में बुरहानुद्दीन ने दुर्ग को घेर लिया। मराठों की सहायक सेना देर से और कम बल के साथ पहुँची, घेरा न तोड़ सकी। दुर्ग में पानी और अनाज घटता गया, और जुलाई में वेंकटराव ने दुर्ग सौंप दिया। टीपू के सैनिक सरदार और उसके परिवार को बंदी बनाकर ले गए, जबकि पुणे के अनुसार शर्तें कुछ और तय हुई थीं। नाना फड़नवीस ने इसे पेशवा के संरक्षण का अपमान माना, और कुछ ही महीनों में मराठे और निज़ाम मैसूर के विरुद्ध मैदान में उतर आए।

पुणे के पेशवा
राजवंश · 1713–1818 ई.पुणे के पेशवापेशवा छत्रपतियों के वंशानुगत प्रधानमन्त्री थे, और 1713 से 1818 तक पुणे से मराठा राज्य उन्हीं के हाथ में रहा। बाजीराव प्रथम और उनके पुत्र नानासाहेब के समय मराठे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बने, फिर 1761 का पानीपत आया और अंग्रेज़ों से युद्ध, जिनमें 1818 में यह वंश समाप्त हुआ।पढ़ें →
महत्त्व

नरगुंद 1785–87 के मराठा-मैसूर युद्ध की चिंगारी बना, जो बादामी, अदोनी, सवणूर और बहादुर बेंडा में लड़ा गया।