अध्याय का सार श्रीभगवान जो अब अर्जुन से कहते हैं, उसे वे सब विद्याओं का राजा और सब गोपनीयों का राजा बताते हैं, जो पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला, करने में सुखद और अविनाशी है। वे अपने अव्यक्त रूप से सारे जगत में व्याप्त हैं; सब प्राणी उनमें स्थित हैं, फिर भी वे उनमें सीमित नहीं हैं, जैसे सर्वत्र बहने वाली वायु आकाश में ही स्थित रहती है। कल्प के अन्त में सब प्राणी उनकी प्रकृति में लीन होते हैं और अगले कल्प के आरम्भ में वे उन्हें फिर रचते हैं, उदासीन के समान रहकर, इन कर्मों से बँधे बिना। मूढ़ लोग उनके मनुष्य-रूप धारण करने पर उनकी अवहेलना करते हैं; दैवी प्रकृति वाले महात्मा अनन्य मन से, दृढ़ व्रत के साथ उनका कीर्तन करते हुए उन्हें भजते हैं। वे ही क्रतु, यज्ञ, स्वधा, औषधि, मन्त्र, घृत, अग्नि और हवन हैं; जगत के पिता, माता, धाता और पितामह, ओंकार और तीनों वेद हैं। वैदिक कर्मों से स्वर्ग चाहने वाले पुण्य क्षीण होने पर लौट आते हैं। जो अनन्य भाव से उनका चिन्तन करते हैं, उनका योगक्षेम वे स्वयं वहन करते हैं। प्रेम से अर्पित पत्र, पुष्प, फल या जल को वे स्वीकार करते हैं। अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्य भाव से उन्हें भजे तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उनका भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
9.1 इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्
idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmyanasūyave | jñānaṃ vijñānasahitaṃ yajjñātvā mokṣyase'śubhāt
दोष-दृष्टि से रहित तुमसे मैं यह परम गोपनीय ज्ञान विज्ञान सहित कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।
9.2 राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्
rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam | pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartumavyayam
यह सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अत्यन्त पवित्र और उत्तम है। यह प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला, धर्मयुक्त, करने में अत्यन्त सुगम और अविनाशी है।
9.3 अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa | aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani
हे परन्तप, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।
9.4 मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः
mayā tatamidaṃ sarvaṃ jagadavyaktamūrtinā | matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥ
यह सारा जगत मुझ अव्यक्त-स्वरूप से व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
9.5 न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः
na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram | bhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ
और फिर भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं। मेरे ईश्वरीय योग को देखो! मेरा आत्मा प्राणियों को धारण करने वाला और उत्पन्न करने वाला है, फिर भी उनमें स्थित नहीं है।
9.6 यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय
yathākāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān | tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya
जैसे सर्वत्र विचरने वाली महान वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, ऐसा जानो।
9.7 सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām | kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham
हे कौन्तेय, कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर रचता हूँ।
9.8 प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्
prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ | bhūtagrāmamimaṃ kṛtsnamavaśaṃ prakṛtervaśāt
अपनी प्रकृति को वश में करके, प्रकृति के अधीन होने से विवश इस सम्पूर्ण प्राणी-समुदाय को मैं बार-बार रचता हूँ।
9.9 न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु
na ca māṃ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanaṃjaya | udāsīnavadāsīnamasaktaṃ teṣu karmasu
हे धनंजय, वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के समान स्थित रहता हूँ।
9.10 मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram | hetunānena kaunteya jagadviparivartate
हे कौन्तेय, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर और अचर सहित सब जगत को उत्पन्न करती है। इसी कारण यह जगत घूमता रहता है।
9.11 अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्
avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanumāśritam | paraṃ bhāvamajānanto mama bhūtamaheśvaram
मूढ़ लोग मनुष्य-शरीर धारण करने पर मेरी अवहेलना करते हैं, क्योंकि वे सब प्राणियों के महान ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते।
9.12 मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः
moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ | rākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ
व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले वे विवेकहीन लोग मोहित करने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति का आश्रय लिए रहते हैं।
9.13 महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्
mahātmānastu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtimāśritāḥ | bhajantyananyamanaso jñātvā bhūtādimavyayam
परन्तु हे पार्थ, दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा मुझे सब प्राणियों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से भजते हैं।
9.14 सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते
satataṃ kīrtayanto māṃ yatantaśca dṛḍhavratāḥ | namasyantaśca māṃ bhaktyā nityayuktā upāsate
वे सदा मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत के साथ यत्न करते हुए, भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए, नित्य युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।
9.15 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्
jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate | ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham
दूसरे ज्ञानयज्ञ द्वारा मेरा यजन करते हुए मुझ विश्वतोमुख की एकत्व-भाव से, पृथक-भाव से और अनेक प्रकार से उपासना करते हैं।
9.16 अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्
ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhāhamahamauṣadham | mantro'hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutam
मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषधि हूँ। मैं मन्त्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं अग्नि हूँ और हवन की क्रिया भी मैं ही हूँ।
9.17 पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च
pitāhamasya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ | vedyaṃ pavitramoṃkāra ṛksāma yajureva ca
इस जगत का पिता, माता, धाता और पितामह मैं हूँ। जानने योग्य, पवित्र करने वाला, ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
9.18 गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्
gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt | prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījamavyayam
मैं गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण और सुहृद हूँ। मैं उत्पत्ति, प्रलय, आधार, निधान और अविनाशी बीज हूँ।
9.19 तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca | amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna
मैं ही तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन, मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ, और सत् तथा असत् भी मैं ही हूँ।
9.20 त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्
traividyā māṃ somapāḥ pūtapāpā yajñairiṣṭvā svargatiṃ prārthayante | te puṇyamāsādya surendraloka- maśnanti divyāndivi devabhogān
तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले, पापरहित लोग यज्ञों द्वारा मेरा यजन करके स्वर्ग-प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। वे पुण्य से इन्द्रलोक को पाकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं।
9.21 ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते
te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti | evaṃ trayīdharmamanuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante
उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर वे फिर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का पालन करने वाले, भोगों की कामना करने वाले लोग बार-बार आवागमन को ही पाते हैं।
9.22 अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्
ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham
जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
9.23 येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्
ye'pyanyadevatābhaktā yajante śraddhayānvitāḥ | te'pi māmeva kaunteya yajantyavidhipūrvakam
हे कौन्तेय, जो भक्त श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, परन्तु विधिपूर्वक नहीं।
9.24 अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते
ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca | na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te
क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए गिर जाते हैं।
9.25 यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्
yānti devavratā devānpitṝnyānti pitṛvratāḥ | bhūtāni yānti bhūtejyā yānti madyājino'pi mām
देवताओं का व्रत रखने वाले देवताओं को, पितरों का व्रत रखने वाले पितरों को, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा यजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।
9.26 पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati | tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ
जो कोई भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले के भक्तिपूर्वक दिए हुए उस उपहार को मैं ग्रहण करता हूँ।
9.27 यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्
yatkaroṣi yadaśnāsi yajjuhoṣi dadāsi yat | yattapasyasi kaunteya tatkuruṣva madarpaṇam
हे कौन्तेय, तुम जो कुछ करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो, वह सब मुझे अर्पण करो।
9.28 शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि
śubhāśubhaphalairevaṃ mokṣyase karmabandhanaiḥ | saṃnyāsayogayuktātmā vimukto māmupaiṣyasi
इस प्रकार तुम शुभ और अशुभ फल वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाओगे। संन्यासयोग से युक्त चित्त वाले तुम मुक्त होकर मुझे ही प्राप्त होगे।
9.29 समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्
samo'haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpyaham
मैं सब प्राणियों में समान हूँ; न कोई मेरा द्वेषी है, न प्रिय। परन्तु जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
9.30 अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः
api cetsudurācāro bhajate māmananyabhāk | sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ
यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने उचित निश्चय कर लिया है।
9.31 क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati | kaunteya prati jānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय, तुम निश्चयपूर्वक घोषणा करो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
9.32 मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्
māṃ hi pārtha vyapāśritya ye'pi syuḥ pāpayonayaḥ | striyo vaiśyāstathā śūdrāste'pi yānti parāṃ gatim
हे पार्थ, जो मेरी शरण लेते हैं, वे चाहे पाप-योनि वाले हों, स्त्रियाँ हों, वैश्य हों या शूद्र हों, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
9.33 किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्
kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā | anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva mām
फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों का तो कहना ही क्या! इस अनित्य और सुखरहित लोक को पाकर तुम मेरा भजन करो।
9.34 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru | māmevaiṣyasi yuktvaivamātmānaṃ matparāyaṇaḥ
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो, मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार अपने को मुझमें लगाकर, मेरे परायण होकर तुम मुझे ही प्राप्त होगे।
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