अध्याय 3

कर्मयोगः

कर्मयोग — कर्म का योग

43 श्लोक

अध्याय का सार

अर्जुन उलझन में हैं: यदि बुद्धि कर्म से श्रेष्ठ है, तो उन्हें इस घोर कर्म में क्यों लगाया जा रहा है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि दो निष्ठाएँ पहले से कही गई हैं, सांख्यों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग, और कर्म आरंभ न करने से कोई निष्कर्मता नहीं पाता। कोई भी क्षण भर बिना कर्म किए नहीं रहता; प्रकृति के गुण सबसे कर्म कराते हैं। इसलिए आसक्ति छोड़कर, यज्ञ के लिए, नियत कर्म करो। प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा रची, और चक्र चलता है: अन्न से प्राणी, वर्षा से अन्न, यज्ञ से वर्षा। जनक आदि ने कर्म से ही सिद्धि पाई। भगवान को तीनों लोकों में कुछ पाना नहीं, फिर भी वे कर्म करते हैं, क्योंकि लोग श्रेष्ठ का अनुसरण करते हैं। सब कर्म गुण करते हैं; अहंकार से मोहित ही कहता है, "मैं कर्ता हूँ।" दूसरे के भली प्रकार किए धर्म से अपना गुणरहित धर्म भी श्रेष्ठ है। अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है। भगवान कहते हैं: रजोगुण से उत्पन्न काम, जो क्रोध बन जाता है। इन्द्रियों को वश में करके इस शत्रु को मारो।

अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच

3.1

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव

jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana |
tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava

हे जनार्दन, यदि आप कर्म से बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं?

3.2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्

vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me |
tadekaṃ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyām

आप मिले-जुले से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए निश्चय करके एक बात बताइए जिससे मैं कल्याण प्राप्त करूँ।

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

3.3

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्

loke'smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha |
jñānayogena sāṃkhyānāṃ karmayogena yoginām

हे निष्पाप, इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है: सांख्यों के लिए ज्ञानयोग से और योगियों के लिए कर्मयोग से।

3.4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति

na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo'śnute |
na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati

मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ न करने से निष्कर्मता पाता है, और न केवल त्याग कर देने से सिद्धि पाता है।

3.5

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः

na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt |
kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ

कोई भी मनुष्य क्षण भर भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण सबसे विवश करके कर्म करवाते हैं।

3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते

karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate

जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ मिथ्याचारी, अर्थात् पाखण्डी कहलाता है।

3.7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते

yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna |
karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate

परन्तु हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

3.8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः

niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ |
śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ

तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकेगा।

3.9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर

yajñārthātkarmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ |
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara

यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों से यह संसार बंधता है। इसलिए हे कौन्तेय, आसक्ति छोड़कर यज्ञ के लिए भली प्रकार कर्म करो।

3.10

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्

sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ |
anena prasaviṣyadhvameṣa vo'stviṣṭakāmadhuk

सृष्टि के आरंभ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा को रचकर कहा: इसी से तुम वृद्धि पाओ, यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित वस्तुएँ देने वाली कामधेनु हो।

3.11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ

devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha

इस यज्ञ से तुम देवताओं को संतुष्ट करो और वे देवता तुम्हें संतुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे को संतुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण पाओगे।

3.12

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |
tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

यज्ञ से संतुष्ट देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। उनके दिए भोगों को जो उन्हें अर्पण किए बिना स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।

3.13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ |
bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। और जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पापी तो पाप ही खाते हैं।

3.14

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः

annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ |
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ

सब प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।

3.15

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्

karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam

कर्म को वेद से उत्पन्न जानो और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

3.16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ |
aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati

हे पार्थ, जो इस प्रकार चलाए हुए चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों में रमने वाला पापमय जीवन वाला पुरुष व्यर्थ ही जीता है।

3.17

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते

yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ |
ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

3.18

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः

naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana |
na cāsya sarvabhūteṣu kaścidarthavyapāśrayaḥ

उसका इस संसार में न कर्म करने से कोई प्रयोजन है, न कर्म न करने से। और सब प्राणियों में भी उसका किसी से कोई स्वार्थ का संबंध नहीं रहता।

3.19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः

tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara |
asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ

इसलिए तुम आसक्ति छोड़कर निरंतर कर्तव्य कर्म भली प्रकार करते रहो, क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने वाला पुरुष परमात्मा को प्राप्त होता है।

3.20

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि

karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ |
lokasaṃgrahamevāpi saṃpaśyankartumarhasi

जनक आदि ज्ञानी भी कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए। लोकसंग्रह, अर्थात् जगत के हित को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।

3.21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते

yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ |
sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।

3.22

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि

na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiṃcana |
nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi

हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है, और न कोई पाने योग्य वस्तु है जो मुझे न मिली हो। फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।

3.23

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ |
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ

क्योंकि हे पार्थ, यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ, तो मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।

3.24

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः

utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham |
saṃkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ

यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँ, और मैं संकरता का कारण बनूँ तथा इस प्रजा का नाश करने वाला बनूँ।

3.25

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्

saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata |
kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham

हे भारत, जैसे कर्म में आसक्त अज्ञानी कर्म करते हैं, वैसे ही अनासक्त ज्ञानी को लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।

3.26

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्

na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām |
joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran

ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे। स्वयं योग में स्थित होकर सब कर्म भली प्रकार करते हुए उनसे भी वैसा ही करवाए।

3.27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते

prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
ahaṃkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate

सब कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला मनुष्य मानता है, "मैं कर्ता हूँ।"

3.28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ |
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate

परन्तु हे महाबाहो, गुण और कर्म के विभाग का तत्त्व जानने वाला ज्ञानी यह समझकर कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, उनमें आसक्त नहीं होता।

3.29

प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

prakṛterguṇasaṃmūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu |
tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet

प्रकृति के गुणों से मोहित लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। पूर्ण ज्ञान रखने वाला पुरुष अधूरा जानने वाले उन मंदबुद्धियों को विचलित न करे।

3.30

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

mayi sarvāṇi karmāṇi saṃnyasyādhyātmacetasā |
nirāśīrnirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ

अपने चित्त को आत्मा में लगाकर, सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा और ममता से रहित होकर, संताप छोड़कर युद्ध करो।

3.31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ |
śraddhāvanto'nasūyanto mucyante te'pi karmabhiḥ

जो मनुष्य श्रद्धा रखकर और दोषदृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं।

3.32

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ

परन्तु जो दोषदृष्टि रखते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन्हें सब ज्ञान में मोहित, नष्ट हुए और विवेकहीन समझो।

3.33

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति

sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi |
prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati

ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं। फिर हठपूर्वक दमन क्या करेगा?

3.34

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau |
tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau

हर इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे रहते हैं। मनुष्य को उनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे उसके मार्ग के शत्रु हैं।

3.35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ

अच्छी प्रकार आचरण किए गए दूसरे के धर्म से गुणरहित होने पर भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।

अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच

3.36

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः

atha kena prayukto'yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ |
anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ

हे वार्ष्णेय, फिर यह मनुष्य न चाहते हुए भी, मानो बलपूर्वक लगाया हुआ, किसकी प्रेरणा से पाप करता है?

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

3.37

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्

kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ |
mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam

रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है। यह कभी तृप्त न होने वाला और महापापी है। इसे ही इस विषय में शत्रु जानो।

3.38

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्

dhūmenāvriyate vahniryathādarśo malena ca |
yatholbenāvṛto garbhastathā tenedamāvṛtam

जैसे धुएँ से अग्नि ढकी रहती है, धूल से दर्पण और गर्भ से भ्रूण, वैसे ही इस काम से यह ज्ञान ढका रहता है।

3.39

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च

āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā |
kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca

हे कौन्तेय, अग्नि के समान कभी पूर्ण न होने वाले इस काम रूपी, ज्ञानियों के नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान ढका हुआ है।

3.40

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्

indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate |
etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवासस्थान कहे जाते हैं। इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर देही को मोहित करता है।

3.41

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्

tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha |
pāpmānaṃ prajahi hyenaṃ jñānavijñānanāśanam

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी काम को अवश्य ही मार डालो।

3.42

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः

indriyāṇi parāṇyāhurindriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
manasastu parā buddhiryo buddheḥ paratastu saḥ

इन्द्रियों को श्रेष्ठ कहा जाता है, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, वह आत्मा है।

3.43

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्

evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā |
jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam

इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर, बुद्धि द्वारा मन को वश में करके, हे महाबाहो, इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार डालो।