अध्याय 8

अक्षरब्रह्मयोगः

अक्षरब्रह्मयोग — अविनाशी ब्रह्म का योग

28 श्लोक

अध्याय का सार

पिछले अध्याय के अन्तिम वचनों को लेकर अर्जुन सात प्रश्न पूछते हैं: ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है, अधिभूत और अधिदैव क्या हैं, इस देह में अधियज्ञ कौन है, और मृत्यु के समय भगवान कैसे जाने जाते हैं। श्रीभगवान प्रत्येक का उत्तर देते हैं। परम अक्षर ब्रह्म है; अपना स्वभाव अध्यात्म है; प्राणियों को उत्पन्न करने वाला त्याग कर्म कहलाता है; नाशवान भाव अधिभूत है; पुरुष अधिदैव है; और देह में स्थित स्वयं भगवान अधियज्ञ हैं। अन्त समय मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है, इसलिए अर्जुन को सब समय उनका स्मरण करते हुए युद्ध करना है। जो योगी प्राण को भौंहों के बीच स्थिर करके, एकाक्षर ब्रह्म ओम का उच्चारण करते हुए देह त्यागता है, वह परम गति पाता है। ब्रह्मलोक तक सब लोक पुनरावर्ती हैं, पर भगवान को प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता। ब्रह्मा का दिन एक हजार युगों का है और रात्रि भी उतनी ही; दिन के आरम्भ में प्राणी प्रकट होते हैं और रात्रि आने पर लीन हो जाते हैं। उस अव्यक्त से परे एक और सनातन अव्यक्त है, वही भगवान का परम धाम है। शुक्ल और कृष्ण, दो मार्ग बताए गए हैं, एक से लौटना नहीं होता, दूसरे से लौटना होता है। इन्हें जानने वाला योगी मोहित नहीं होता और वेद, यज्ञ, तप और दान के पुण्य से भी आगे आदि परम स्थान को पाता है।

अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच

8.1

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते

kiṃ tadbrahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama |
adhibhūtaṃ ca kiṃ proktamadhidaivaṃ kimucyate

हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे कहते हैं?

8.2

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः

adhiyajñaḥ kathaṃ ko'tra dehe'sminmadhusūdana |
prayāṇakāle ca kathaṃ jñeyo'si niyatātmabhiḥ

हे मधुसूदन, इस देह में अधियज्ञ कौन है और वह इसमें किस प्रकार है? और संयमी पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाने जाते हैं?

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

8.3

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः

akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo'dhyātmamucyate |
bhūtabhāvodbhavakaro visargaḥ karmasaṃjñitaḥ

परम अक्षर ब्रह्म है। उसका अपना स्वभाव अध्यात्म कहलाता है। प्राणियों के भाव को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (त्याग) कर्म कहलाता है।

8.4

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर

adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam |
adhiyajño'hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara

हे देहधारियों में श्रेष्ठ, नाशवान भाव अधिभूत है, पुरुष अधिदैव है, और इस देह में अधियज्ञ मैं ही हूँ।

8.5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः

antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaram |
yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ

जो अन्त समय में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

8.6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः

yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram |
taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ

हे कौन्तेय, मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, सदा उसी भाव में रँगा रहने के कारण वह उसी को प्राप्त होता है।

8.7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्

tasmātsarveṣu kāleṣu māmanusmara yudhya ca |
mayyarpitamanobuddhirmāmevaiṣyasyasaṃśayam

इसलिए तुम सब समय मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके तुम निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगे।

8.8

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्

abhyāsayogayuktena cetasā nānyagāminā |
paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan

हे पार्थ, अभ्यासयोग से युक्त, अन्यत्र न जाने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का निरन्तर चिन्तन करने वाला उसी को प्राप्त होता है।

8.9

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्

kaviṃ purāṇamanuśāsitāramaṇoraṇīyāṃsamanusmaredyaḥ |
sarvasya dhātāramacintyarūpamādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt

जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके शासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले, अचिन्त्य रूप वाले, सूर्य के समान प्रकाशमान और अन्धकार से परे हैं, उनका स्मरण करना चाहिए।

8.10

प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्

prayāṇakāle manasācalena
bhaktyā yukto yogabalena caiva |
bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak
sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam

प्रयाण के समय अचल मन से, भक्ति और योगबल से युक्त होकर, प्राण को भौंहों के बीच भली-भाँति स्थापित करके वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

8.11

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये

yadakṣaraṃ vedavido vadanti
viśanti yadyatayo vītarāgāḥ |
yadicchanto brahmacaryaṃ caranti
tatte padaṃ saṃgraheṇa pravakṣye

वेद के जानने वाले जिसे अक्षर कहते हैं, रागरहित यति जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।

8.12

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्

sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca |
mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām

सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित होकर,

8.13

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्

omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran |
yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim

जो 'ओम्' इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ देह त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

8.14

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः

ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ |
tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ

हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से सदा, प्रतिदिन मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।

8.15

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः

māmupetya punarjanma duḥkhālayamaśāśvatam |
nāpnuvanti mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ

मुझे प्राप्त होकर परम सिद्धि को पहुँचे हुए महात्मा दुःखों के घर और अनित्य पुनर्जन्म को फिर नहीं पाते।

8.16

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते

ābrahmabhuvanāllokāḥ punarāvartino'rjuna |
māmupetya tu kaunteya punarjanma na vidyate

हे अर्जुन, ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कौन्तेय, मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।

8.17

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः

sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇo viduḥ |
rātriṃ yugasahasrāntāṃ te'horātravido janāḥ

जो जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन एक हजार युगों तक रहता है और उनकी रात्रि भी एक हजार युगों में पूरी होती है, वही लोग दिन और रात्रि के तत्त्व को जानने वाले हैं।

8.18

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके

avyaktādvyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame |
rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake

ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त से प्रकट होते हैं, और रात्रि के आने पर उसी अव्यक्त नामक तत्त्व में लीन हो जाते हैं।

8.19

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे

bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ bhūtvā bhūtvā pralīyate |
rātryāgame'vaśaḥ pārtha prabhavatyaharāgame

हे पार्थ, यही प्राणियों का समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर, रात्रि आने पर विवश होकर लीन होता है और दिन आने पर फिर उत्पन्न होता है।

8.20

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

parastasmāttu bhāvo'nyo'vyakto'vyaktātsanātanaḥ |
yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati

परन्तु उस अव्यक्त से भी परे एक दूसरा सनातन अव्यक्त भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।

8.21

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

avyakto'kṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim |
yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama

वह अव्यक्त 'अक्षर' कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं। जिसे पाकर मनुष्य लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।

8.22

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā |
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvamidaṃ tatam

हे पार्थ, जिनके भीतर सब प्राणी स्थित हैं और जिनसे यह सब व्याप्त है, वे परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होते हैं।

8.23

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ

yatra kāle tvanāvṛttimāvṛttiṃ caiva yoginaḥ |
prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं वह काल बताता हूँ, जिसमें शरीर छोड़कर गए योगी लौटकर नहीं आते और जिसमें गए हुए लौटकर आते हैं।

8.24

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

agnirjyotirahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam |
tatra prayātā gacchanti brahma brahmavido janāḥ

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह मास, इस मार्ग से गए हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

8.25

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते

dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam |
tatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate

धुआँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह मास, इस मार्ग से गया हुआ योगी चन्द्रमा की ज्योति को पाकर लौट आता है।

8.26

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः

śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate |
ekayā yātyanāvṛttimanyayāvartate punaḥ

जगत के ये शुक्ल और कृष्ण दो मार्ग सनातन माने गए हैं। एक से जाने वाला लौटता नहीं और दूसरे से जाने वाला फिर लौट आता है।

8.27

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन

naite sṛtī pārtha jānanyogī muhyati kaścana |
tasmātsarveṣu kāleṣu yogayukto bhavārjuna

हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, तुम सब समय योग से युक्त रहो।

8.28

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्

vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva
dāneṣu yat puṇyaphalaṃ pradiṣṭam |
atyeti tatsarvamidaṃ viditvā
yogī paraṃ sthānamupaiti cādyam

वेदों में, यज्ञों में, तपों में और दानों में जो पुण्य-फल बताया गया है, इस तत्त्व को जानकर योगी उस सबको लाँघ जाता है और आदि परम स्थान को प्राप्त होता है।