अध्याय 12

भक्तियोगः

भक्तियोग — भक्ति का योग

20 श्लोक

अध्याय का सार

अर्जुन पूछते हैं कि कौन-से उपासक योग को श्रेष्ठ जानते हैं: जो भगवान के साकार रूप के भक्त हैं, या जो अक्षर, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो परम श्रद्धा से मन उनमें लगाते हैं, वे सबसे अधिक युक्त हैं। अव्यक्त के उपासक भी उन्हें ही पाते हैं, पर उनका मार्ग कठिन है, क्योंकि देहधारी के लिए निराकार की प्राप्ति बहुत क्लेश से होती है। जो सब कर्म उन्हें अर्पित करके अनन्य भाव से उनका ध्यान करते हैं, उन्हें वे मृत्युरूपी संसार-सागर से शीघ्र उबार लेते हैं। फिर वे साधना की सीढ़ी बताते हैं: मन मुझमें लगाओ; न हो सके तो अभ्यास करो; वह भी न हो तो मेरे लिए कर्म करो; वह भी न हो तो कर्मफल का त्याग करो। फल के त्याग से तुरंत शांति मिलती है। अध्याय के अंत में भगवान अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताते हैं: द्वेषरहित, मैत्री और करुणा से भरा, मान-अपमान में सम, जो मिले उसी में संतुष्ट और स्थिर बुद्धि वाला।

अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच

12.1

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः

evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate |
ye cāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ

जो भक्त इस प्रकार निरंतर आपमें लगे रहकर आपकी उपासना करते हैं, और जो अविनाशी अव्यक्त की उपासना करते हैं, उनमें योग को उत्तम जानने वाले कौन हैं?

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

12.2

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः

mayyāveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetāste me yuktatamā matāḥ

जो मुझमें मन लगाकर, निरंतर मुझसे जुड़े हुए, परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सबसे उत्तम योगी हैं।

12.3

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate |
sarvatragamacintyaṃ ca kūṭasthamacalaṃ dhruvam

पर जो उस अक्षर की उपासना करते हैं जो अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव है,

12.4

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

saṃniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ

जो सब इंद्रियों को भली-भाँति वश में करके, सर्वत्र समबुद्धि रखते हुए, सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।

12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते

kleśo'dhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasām |
avyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate

जिनका चित्त अव्यक्त में आसक्त है, उनका क्लेश अधिक है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की गति कठिनाई से प्राप्त होती है।

12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ |
ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate

पर जो सब कर्मों को मुझे अर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,

12.7

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्

teṣāmahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt |
bhavāmi nacirātpārtha mayyāveśitacetasām

हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें प्रविष्ट है, उनका मैं शीघ्र ही मृत्युरूपी संसार-सागर से उद्धार करने वाला बनता हूँ।

12.8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः

mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya |
nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ

मुझमें ही मन लगाओ, मुझमें ही बुद्धि को स्थिर करो। इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें संशय नहीं।

12.9

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय

atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram |
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanaṃjaya

यदि तुम मन को मुझमें स्थिर रूप से लगाने में समर्थ नहीं हो, तो हे धनंजय, अभ्यासयोग के द्वारा मुझे पाने की इच्छा करो।

12.10

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि

abhyāse'pyasamartho'si matkarmaparamo bhava |
madarthamapi karmāṇi kurvansiddhimavāpsyasi

यदि अभ्यास में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि प्राप्त करोगे।

12.11

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्

athaitadapyaśakto'si kartuṃ madyogamāśritaḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ tataḥ kuru yatātmavān

यदि यह भी करने में असमर्थ हो, तो मेरे योग का आश्रय लेकर, मन को वश में करके, सब कर्मों के फल का त्याग करो।

12.12

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्

śreyo hi jñānamabhyāsājjñānāddhyānaṃ viśiṣyate |
dhyānātkarmaphalatyāgastyāgācchāntiranantaram

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तुरंत ही शांति मिलती है।

12.13

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca |
nirmamo nirahaṃkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र है और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में सम है और क्षमाशील है,

12.14

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः

saṃtuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayyarpitamanobuddhiryo madbhaktaḥ sa me priyaḥ

जो सदा संतुष्ट है, योगी है, मन को वश में रखता है, दृढ़ निश्चय वाला है और जिसने मन-बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

12.15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः

yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ

जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है।

12.16

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ

जो किसी से अपेक्षा नहीं रखता, पवित्र है, कुशल है, उदासीन है, व्यथा से रहित है और जिसने सब आरंभों का त्याग कर दिया है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

12.17

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः

yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati |
śubhāśubhaparityāgī bhaktimānyaḥ sa me priyaḥ

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, जो शुभ और अशुभ दोनों का त्यागी है, वह भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

12.18

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः

samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ

जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में सम है, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है और आसक्ति से रहित है,

12.19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः

tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit |
aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ

जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, मननशील है, जो कुछ मिल जाए उसी में संतुष्ट है, घर में ममता नहीं रखता, स्थिर बुद्धि वाला और भक्तिमान है, वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

12.20

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः

ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate |
śraddadhānā matparamā bhaktāste'tīva me priyāḥ

पर जो श्रद्धा से युक्त होकर, मुझे परम मानकर, मेरे कहे इस धर्ममय अमृत का भली-भाँति सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं।