अध्याय 7

ज्ञानविज्ञानयोगः

ज्ञानविज्ञानयोग — ज्ञान और विज्ञान का योग

30 श्लोक

अध्याय का सार

अब श्रीभगवान अपने स्वरूप के विषय में सीधे कहते हैं। वे अर्जुन को विज्ञान सहित वह ज्ञान देने का वचन देते हैं, जिसे जान लेने पर और कुछ जानने को शेष नहीं रहता। हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए यत्न करता है, और यत्न करने वालों में भी कोई एक ही उन्हें तत्त्व से जानता है। वे अपनी दो प्रकृतियाँ बताते हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार वाली आठ प्रकार की अपरा प्रकृति, और जीवरूपा परा प्रकृति, जो इस जगत को धारण करती है। सब प्राणी इन्हीं से उत्पन्न होते हैं, और भगवान ही सम्पूर्ण जगत के उद्गम और प्रलय हैं; यह सारा जगत उनमें वैसे ही पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ। वे जल में रस हैं, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हैं, सब वेदों में ओंकार हैं। तीन गुणों वाली उनकी दैवी माया दुस्तर है, पर जो उनकी शरण लेते हैं वे इसे पार कर जाते हैं। चार प्रकार के पुण्यात्मा उन्हें भजते हैं: आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। अनेक जन्मों के अन्त में 'वासुदेव ही सब कुछ हैं' ऐसा जानने वाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। कामनाओं के लिए अन्य देवताओं को पूजने वालों को भी वे फल भगवान ही देते हैं, और जो उन्हें अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी उन्हें जानते हैं।

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

7.1

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु

mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ |
asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu

हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाले, मेरे आश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से, बिना किसी संशय के, जिस प्रकार जानोगे, वह सुनो।

7.2

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

jñānaṃ te'haṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ |
yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate

मैं तुम्हें यह ज्ञान विज्ञान सहित पूर्ण रूप से कहूँगा, जिसे जान लेने पर इस संसार में फिर और कुछ जानने योग्य शेष नहीं रहता।

7.3

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः

manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye |
yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ

हजारों मनुष्यों में कोई एक ही सिद्धि के लिए यत्न करता है, और यत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से जानता है।

7.4

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

bhūmirāpo'nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca |
ahaṃkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, यह आठ प्रकार से विभक्त मेरी प्रकृति है।

7.5

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्

apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām |
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat

यह मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो, इससे भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृति को जानो, जिसके द्वारा यह सारा जगत धारण किया जाता है।

7.6

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा

etadyonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya |
ahaṃ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā

यह समझो कि सब प्राणी इन्हीं दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न होते हैं। मैं ही सम्पूर्ण जगत का उद्गम हूँ और मैं ही उसका प्रलय भी हूँ।

7.7

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव

mattaḥ parataraṃ nānyatkiṃcidasti dhanaṃjaya |
mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva

हे धनंजय, मुझसे परे और कुछ भी नहीं है। यह सब कुछ मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियों के दाने।

7.8

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु

raso'hamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu

हे कौन्तेय, मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।

7.9

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु

puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṃ ca tejaścāsmi vibhāvasau |
jīvanaṃ sarvabhūteṣu tapaścāsmi tapasviṣu

मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ। मैं सब प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।

7.10

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्

bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanam |
buddhirbuddhimatāmasmi tejastejasvināmaham

हे पार्थ, मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।

7.11

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ

balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāmarāgavivarjitam |
dharmāviruddho bhūteṣu kāmo'smi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, मैं बलवानों का काम और राग से रहित बल हूँ, और प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम मैं ही हूँ।

7.12

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि

ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye |
matta eveti tānviddhi na tvahaṃ teṣu te mayi

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, उन्हें मुझसे ही उत्पन्न जानो। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

7.13

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्

tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat |
mohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam

तीनों गुणों से बने इन भावों से मोहित होकर यह सारा जगत मुझे नहीं पहचानता, जो इनसे परे और अविनाशी हूँ।

7.14

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते

daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā |
māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te

यह मेरी गुणमयी दैवी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

7.15

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः

na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ |
māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ

दुष्कर्म करने वाले, मूढ़ और नराधम मेरी शरण नहीं लेते। माया ने उनका ज्ञान हर लिया है और वे आसुरी भाव का आश्रय लिए हुए हैं।

7.16

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ

caturvidhā bhajante māṃ janāḥ sukṛtino'rjuna |
ārto jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन, चार प्रकार के पुण्यात्मा मनुष्य मुझे भजते हैं: आर्त (संकट में पड़ा), जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।

7.17

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः

teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate |
priyo hi jñānino'tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ

इनमें नित्य मुझमें लगा हुआ, एक मुझमें ही भक्ति रखने वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है। ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

7.18

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्

udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam |
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim

ये सभी उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह युक्तचित्त होकर सर्वोत्तम गति, मुझमें ही स्थित है।

7.19

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः

bahūnāṃ janmanāmante jñānavānmāṃ prapadyate |
vāsudevaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ

बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान पुरुष 'वासुदेव ही सब कुछ हैं' ऐसा जानकर मेरी शरण आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

7.20

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया

kāmaistaistairhṛtajñānāḥ prapadyante'nyadevatāḥ |
taṃ taṃ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā

जिनका ज्ञान भिन्न-भिन्न कामनाओं ने हर लिया है, वे अपने स्वभाव से प्रेरित होकर, उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं की शरण लेते हैं।

7.21

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्

yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati |
tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham

जो-जो भक्त जिस-जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की उसी रूप में श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ।

7.22

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्

sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhate |
labhate ca tataḥ kāmānmayaiva vihitānhi tān

उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उस रूप की आराधना करता है और उससे अपनी कामनाएँ पाता है, परन्तु वे कामनाएँ मेरे द्वारा ही विधान की हुई होती हैं।

7.23

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि

antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām |
devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi

परन्तु उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।

7.24

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्

avyaktaṃ vyaktimāpannaṃ manyante māmabuddhayaḥ |
paraṃ bhāvamajānanto mamāvyayamanuttamam

बुद्धिहीन लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्ति-भाव में आया हुआ मानते हैं। वे मेरे अविनाशी और सर्वोत्तम परम भाव को नहीं जानते।

7.25

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्

nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ |
mūḍho'yaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayam

अपनी योगमाया से ढका हुआ मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता। यह मोहित संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

7.26

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन

vedāhaṃ samatītāni vartamānāni cārjuna |
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṃ tu veda na kaścana

हे अर्जुन, मैं बीते हुए, वर्तमान और आने वाले सब प्राणियों को जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

7.27

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप

icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata |
sarvabhūtāni saṃmohaṃ sarge yānti parantapa

हे भारत, हे परन्तप, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वरूपी मोह के कारण सब प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।

7.28

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः

yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām |
te dvandvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ

परन्तु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्वरूपी मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत के साथ मुझे भजते हैं।

7.29

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्

jarāmaraṇamokṣāya māmāśritya yatanti ye |
te brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṃ karma cākhilam

जो मेरा आश्रय लेकर जरा और मृत्यु से छूटने का यत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और समस्त कर्म को जान लेते हैं।

7.30

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः

sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ |
prayāṇakāle'pi ca māṃ te viduryuktacetasaḥ

जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं, वे युक्तचित्त पुरुष प्रयाण के समय भी मुझे ही जानते हैं।