अध्याय का सार श्रीकृष्ण संसार-रूपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन करते हैं, जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ नीचे। वेद के छन्द उसके पत्ते हैं, और जो इस वृक्ष को जानता है वही वेद को जानता है। गुणों से बढ़ी हुई, विषय-रूपी कोंपलों वाली उसकी शाखाएँ ऊपर-नीचे फैली हैं, और उसकी जड़ें मनुष्य-लोक में कर्मों से बाँधती हुई नीचे फैली हैं। उसका रूप, आदि और अन्त यहाँ दिखाई नहीं देते। वे कहते हैं, वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से इसे काटो और उस पद को खोजो जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं, उस आदि पुरुष की शरण लेकर। वहाँ न सूर्य प्रकाश देता है, न चन्द्रमा, न अग्नि; वही उनका परम धाम है। हर देह में स्थित जीव उनका सनातन अंश है, जो इन्द्रियों को एक देह से दूसरी देह में वैसे ले जाता है जैसे वायु गन्ध को। सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज वही हैं, औषधियों को पुष्ट करने वाला सोम वही हैं, प्राणियों में अन्न पचाने वाला वैश्वानर वही हैं, और सबके हृदय में वही बसते हैं। क्षर और अक्षर दोनों से परे पुरुषोत्तम हैं, जो सब वेदों से जानने योग्य हैं।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
15.1 ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्
ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam | chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit
ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले जिस अश्वत्थ वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, वेद के छन्द जिसके पत्ते हैं, उसे जो जानता है वह वेद का जानने वाला है।
15.2 अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ | adhaśca mūlānyanusaṃtatāni karmānubandhīni manuṣyaloke
उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हैं, गुणों से बढ़ी हुई हैं और विषय उनकी कोंपलें हैं। मनुष्य-लोक में कर्मों से बाँधने वाली उसकी जड़ें नीचे भी फैली हुई हैं।
15.3 न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा
na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca saṃpratiṣṭhā | aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūla- masaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā
इसका रूप यहाँ वैसा नहीं दिखता, न इसका अन्त है, न आदि, न ठहराव। इस दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ को वैराग्य-रूपी दृढ़ शस्त्र से काटकर,
15.4 ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी
tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ | tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī
फिर उस पद को खोजना चाहिए, जहाँ गए हुए लोग लौटकर नहीं आते; और यह भाव रखना चाहिए कि मैं उसी आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन संसार-प्रवाह फैला है।
15.5 निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ | dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñai- rgacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat
जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो नित्य अध्यात्म में स्थित हैं, जिनकी कामनाएँ निवृत्त हो गई हैं, जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं, वे ज्ञानी उस अविनाशी पद को पाते हैं।
15.6 न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम
na tadbhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ | yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama
उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि। जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं, वही मेरा परम धाम है।
15.7 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति
mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ | manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati
जीव-लोक में मेरा ही सनातन अंश जीव बना है; वह प्रकृति में स्थित मन सहित छहों इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।
15.8 शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्
śarīraṃ yadavāpnoti yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ | gṛhītvaitāni saṃyāti vāyurgandhānivāśayāt
जब देह का स्वामी जीव कोई शरीर पाता है और जब उसे छोड़ता है, तब इन्हें साथ लेकर वैसे ही जाता है जैसे वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को ले जाती है।
15.9 श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca | adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate
कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर यह जीव विषयों का सेवन करता है।
15.10 उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः
utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam | vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ
शरीर छोड़ते हुए, शरीर में रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर विषय भोगते हुए भी मूढ़ लोग उसे नहीं देखते; ज्ञान-नेत्र वाले देखते हैं।
15.11 यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः
yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam | yatanto'pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ
यत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं; पर जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, वे विवेकहीन यत्न करके भी उसे नहीं देखते।
15.12 यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्
yadādityagataṃ tejo jagadbhāsayate'khilam | yaccandramasi yaccāgnau tattejo viddhi māmakam
सूर्य में जो तेज सारे जगत को प्रकाशित करता है, जो चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है, उस तेज को मेरा ही जानो।
15.13 गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः
gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā | puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ
मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रसमय सोम बनकर सब औषधियों को पुष्ट करता हूँ।
15.14 अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्
ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ dehamāśritaḥ | prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmyannaṃ caturvidham
मैं वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणियों के शरीर में रहता हूँ, और प्राण तथा अपान से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
15.15 सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्
sarvasya cāhaṃ hṛdi saṃniviṣṭo mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ ca | vedaiśca sarvairahameva vedyo vedāntakṛdvedavideva cāham
मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है। सब वेदों द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदान्त का कर्ता और वेद का जानने वाला भी मैं ही हूँ।
15.16 द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते
dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca | kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho'kṣara ucyate
संसार में दो पुरुष हैं, क्षर और अक्षर। सब प्राणी क्षर हैं, और कूटस्थ को अक्षर कहा जाता है।
15.17 उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः
uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ | yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ
परन्तु उत्तम पुरुष इन दोनों से अन्य है, जिसे परमात्मा कहा गया है; वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका धारण-पोषण करता है।
15.18 यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः
yasmātkṣaramatīto'hamakṣarādapi cottamaḥ | ato'smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ
क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
15.19 यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत
yo māmevamasaṃmūḍho jānāti puruṣottamam | sa sarvavidbhajati māṃ sarvabhāvena bhārata
हे भारत, जो मोह-रहित होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ है और सम्पूर्ण भाव से मेरा भजन करता है।
15.20 इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत
iti guhyatamaṃ śāstramidamuktaṃ mayānagha | etadbuddhvā buddhimānsyātkṛtakṛtyaśca bhārata
हे निष्पाप भारत, इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मैंने तुमसे कहा। इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।
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