अध्याय का सार श्रीकृष्ण आरम्भ करते हैं कि संन्यासी वह है जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना अपना कर्तव्य करता है। केवल अग्नि और क्रियाओं को छोड़ देने से कोई संन्यासी नहीं होता। वे कहते हैं, अपने द्वारा अपना उद्धार करो, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। फिर ध्यान का आसन बड़ी सावधानी से बताया जाता है। पवित्र स्थान, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा स्थिर आसन, उस पर कुशा, फिर मृगचर्म, फिर वस्त्र। शरीर, सिर और गर्दन सीधे और अचल, दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर, मन भगवान में। भोजन भी नियमित, नींद भी नियमित। वश में किया हुआ चित्त वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान है, जिसकी लौ नहीं काँपती। अर्जुन सच्चाई से कहते हैं कि मन को रोकना वायु को रोकने जितना कठिन है। भगवान मानते हैं, और उपाय दो शब्दों में देते हैं: अभ्यास और वैराग्य। फिर अर्जुन पूछते हैं कि जो श्रद्धावान साधक इस जीवन में सिद्धि तक नहीं पहुँचा, उसकी क्या गति होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, शुभ कर्म करने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती। वह पवित्र, श्रीमान लोगों के घर या योगियों के कुल में जन्म लेकर वहीं से आगे बढ़ता है। सबसे श्रेष्ठ वह योगी है जो श्रद्धा से भगवान को भजता है।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
6.1 अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ | sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ
जो कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है। केवल अग्नि का त्याग करने वाला या केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है।
6.2 यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava | na hyasaṃnyastasaṃkalpo yogī bhavati kaścana
हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जानो, क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं होता।
6.3 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते
ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate | yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate
योग में आरूढ़ होना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म को साधन कहा गया है, और योग में आरूढ़ हो जाने पर उसी के लिए शम को साधन कहा गया है।
6.4 यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate | sarvasaṃkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate
जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
6.5 उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet | ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ
मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
6.6 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्
bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat
जिसने अपने द्वारा अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए वह स्वयं अपना मित्र है। जिसने नहीं जीता, उसके लिए वह स्वयं ही शत्रु के समान शत्रुता करता है।
6.7 जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ | śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ
जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो शान्त है, उसका परमात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में भी भली-भाँति स्थित रहता है।
6.8 ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ | yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ
जिसका अन्तःकरण ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो निर्विकार और जितेन्द्रिय है, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं, वह योगी युक्त कहलाता है।
6.9 सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu | sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate
जो सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने योग्य, बन्धुगण, साधु और पापी, सबमें समबुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
6.10 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ | ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ
योगी एकान्त स्थान में अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में रखकर, आशा और संग्रह से रहित होकर निरन्तर अपने मन को परमात्मा में लगाए।
6.11 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्
śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ | nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram
पवित्र स्थान में, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, कुशा, मृगचर्म और वस्त्र को क्रम से बिछाकर अपना स्थिर आसन स्थापित करे।
6.12 तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ | upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhaye
उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
6.13 समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ | samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan
शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखकर, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर और इधर-उधर न देखते हुए,
6.14 प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः
praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ | manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ
शान्त और भयरहित होकर, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहकर, मन को संयमित करके मुझमें चित्त लगाए और मेरे परायण होकर योग में बैठे।
6.15 युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ | śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati
इस प्रकार निरन्तर अपने को परमात्मा में लगाता हुआ संयमित मन वाला योगी मुझमें स्थित परम निर्वाणरूप शान्ति को प्राप्त होता है।
6.16 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन
nātyaśnatastu yogo'sti na caikāntamanaśnataḥ | na cāti svapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna
हे अर्जुन, यह योग न बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न सदा जागने वाले का।
6.17 युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu | yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā
जो आहार और विहार में नियमित है, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करता है और जिसका सोना-जागना नियमित है, उसका योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।
6.18 यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा
yadā viniyataṃ cittamātmanyevāvatiṣṭhate | niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā
जब वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है और मनुष्य सब कामनाओं की लालसा से रहित हो जाता है, तब वह युक्त कहलाता है।
6.19 यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः
yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā | yogino yatacittasya yuñjato yogamātmanaḥ
जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक नहीं काँपता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।
6.20 यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā | yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati
योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है, और जिसमें वह आत्मा से आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है,
6.21 सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam | vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ
जिसमें वह इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध बुद्धि से ग्रहण होने वाले अनन्त आनन्द को जानता है, और जिसमें स्थित होकर वह तत्त्व से कभी नहीं डिगता,
6.22 यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ | yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate
जिसे पाकर वह उससे बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता,
6.23 तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा
taṃ vidyādduḥkhasaṃyogaviyogaṃ yogasaṃjñitam | sa niścayena yoktavyo yogo'nirviṇṇacetasā
दुःख के संयोग से वियोग को ही योग जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय और उत्साह भरे चित्त से करना चाहिए।
6.24 संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः
saṃkalpaprabhavānkāmāṃstyaktvā sarvānaśeṣataḥ | manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ
संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर और मन से ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से भली-भाँति रोककर,
6.25 शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्
śanaiḥ śanairuparamedbuddhyā dhṛtigṛhītayā | ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiṃcidapi cintayet
धीरे-धीरे धैर्ययुक्त बुद्धि से उपराम हो, और मन को आत्मा में स्थिर करके कुछ भी चिन्तन न करे।
6.26 यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्
yato yato niścarati manaścañcalamasthiram | tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet
यह चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस कारण से बाहर भटके, उस-उस से हटाकर इसे बार-बार आत्मा में ही लगाए।
6.27 प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्
praśāntamanasaṃ hyenaṃ yoginaṃ sukhamuttamam | upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtamakalmaṣam
जिसका मन पूर्णतः शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, जो पापरहित है और ब्रह्मरूप हो गया है, ऐसे योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।
6.28 युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ | sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute
इस प्रकार निरन्तर अपने को परमात्मा में लगाता हुआ पापरहित योगी सहज ही ब्रह्म के संस्पर्शरूप अनन्त सुख का अनुभव करता है।
6.29 सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः
sarvabhūtasthamātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani | īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ
योग से युक्त आत्मा वाला और सर्वत्र समदृष्टि रखने वाला योगी आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है।
6.30 यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati | tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati
जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।
6.31 सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ | sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate
जो योगी एकीभाव में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझे भजता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही रहता है।
6.32 आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo'rjuna | sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ
हे अर्जुन, जो योगी अपनी उपमा से सबके सुख और दुःख को समान देखता है, वह परम श्रेष्ठ माना गया है।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
6.33 योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana | etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām
हे मधुसूदन, आपने समभाव का जो योग बताया है, मन की चंचलता के कारण मैं उसकी स्थिर स्थिति नहीं देख पाता।
6.34 चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham | tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram
हे कृष्ण, यह मन बड़ा चंचल, मथ डालने वाला, बलवान और हठी है। इसे वश में करना मुझे वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन लगता है।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
6.35 असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam | abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate
हे महाबाहो, निःसन्देह मन चंचल है और कठिनता से वश में होता है। परन्तु हे कौन्तेय, यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
6.36 असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ | vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ
जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए योग पाना कठिन है, ऐसा मेरा मत है। परन्तु मन को वश में करने वाला प्रयत्नशील साधक उचित उपाय से इसे पा सकता है।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
6.37 अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति
ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ | aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati
हे कृष्ण, जो श्रद्धा से युक्त है पर पूरा प्रयत्न नहीं करता, जिसका मन योग से विचलित हो गया है, वह योग की सिद्धि न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
6.38 कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि
kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati | apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi
हे महाबाहो, क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित और आश्रयहीन होकर, दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट तो नहीं हो जाता?
6.39 एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते
etanme saṃśayaṃ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ | tvadanyaḥ saṃśayasyāsya chettā na hyupapadyate
हे कृष्ण, मेरे इस संशय को पूरी तरह काटने में आप ही समर्थ हैं। आपके सिवा इस संशय को मिटाने वाला दूसरा कोई नहीं मिल सकता।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
6.40 पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति
pārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate | na hi kalyāṇakṛtkaściddurgatiṃ tāta gacchati
हे पार्थ, उसका न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में। हे तात, शुभ कर्म करने वाला कोई भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
6.41 प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते
prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ | śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo'bhijāyate
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यात्माओं के लोकों को प्राप्त होकर, वहाँ बहुत वर्षों तक निवास करके, शुद्ध आचरण वाले श्रीमान लोगों के घर में जन्म लेता है।
6.42 अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्
athavā yogināmeva kule bhavati dhīmatām | etaddhi durlabhataraṃ loke janma yadīdṛśam
अथवा वह ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। ऐसा जन्म इस संसार में और भी दुर्लभ है।
6.43 तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam | yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana
हे कुरुनन्दन, वहाँ वह पूर्व शरीर में संचित बुद्धि के संयोग को पा लेता है और फिर सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।
6.44 पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo'pi saḥ | jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate
उसी पूर्व अभ्यास के बल से वह विवश होकर भी योग की ओर खिंच जाता है। योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे सकाम कर्मों के फल को लाँघ जाता है।
6.45 प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्
prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ | anekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim
परन्तु प्रयत्नपूर्वक साधना करने वाला योगी, पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, तब परम गति को प्राप्त होता है।
6.46 तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन
tapasvibhyo'dhiko yogī jñānibhyo'pi mato'dhikaḥ | karmibhyaścādhiko yogī tasmādyogī bhavārjuna
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो।
6.47 योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः
yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā | śraddhāvān bhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ
सब योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझे भजता है, वह मेरे मत में परम श्रेष्ठ युक्त है।
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