अध्याय का सार श्रीकृष्ण सब ज्ञानों में उत्तम उस ज्ञान से आरम्भ करते हैं, जिसे जानकर मुनियों ने परम सिद्धि पाई और जो न सृष्टि के समय जन्म लेते हैं, न प्रलय में व्याकुल होते हैं। महत् प्रकृति उनकी योनि है; उसमें वे गर्भ स्थापित करते हैं, और सब योनियों में जो भी मूर्तियाँ होती हैं, उनके बीज देने वाले पिता वही हैं। प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण देही को बाँधते हैं। सत्त्व निर्मल और प्रकाशक है, सुख और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है। रजस् रागरूप है, तृष्णा से उपजता है, और कर्म की आसक्ति से बाँधता है। तमस् अज्ञान से जन्मा है, और प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा से बाँधता है। ये गुण बारी-बारी एक-दूसरे को दबाते हैं, शरीर और मन में अपने चिह्न दिखाते हैं, और मृत्यु के बाद की गति भी तय करते हैं। अर्जुन पूछते हैं कि गुणों से परे गया पुरुष कैसा होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं: वह सुख-दुःख, निन्दा-स्तुति, मान-अपमान में सम रहता है और अटल भक्ति से भगवान की सेवा करता है। ब्रह्म की प्रतिष्ठा स्वयं भगवान हैं।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
14.1 परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः
paraṃ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṃ jñānamuttamam | yajjñātvā munayaḥ sarve parāṃ siddhimito gatāḥ
मैं फिर से सब ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान कहूँगा, जिसे जानकर सब मुनि यहाँ से परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
14.2 इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ | sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca
इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए हैं; वे सृष्टि के समय उत्पन्न नहीं होते और प्रलय के समय व्याकुल नहीं होते।
14.3 मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत
mama yonirmahadbrahma tasmingarbhaṃ dadhāmyaham | saṃbhavaḥ sarvabhūtānāṃ tato bhavati bhārata
हे भारत, महद्ब्रह्म अर्थात् मूल प्रकृति मेरी योनि है; उसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ। उसी से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
14.4 सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता
sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ saṃbhavanti yāḥ | tāsāṃ brahma mahadyonirahaṃ bījapradaḥ pitā
हे कौन्तेय, सब योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उनकी योनि महद्ब्रह्म है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
14.5 सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्
sattvaṃ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisaṃbhavāḥ | nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam
हे महाबाहो, सत्त्व, रजस् और तमस्, प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण अविनाशी देही को देह में बाँधते हैं।
14.6 तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ
tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam | sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha
हे निष्पाप, इनमें सत्त्व निर्मल होने से प्रकाश देने वाला और विकार-रहित है; वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
14.7 रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्
rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam | tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam
हे कौन्तेय, रजस् को रागरूप जानो, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है; वह देही को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।
14.8 तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत
tamastvajñānajaṃ viddhi mohanaṃ sarvadehinām | pramādālasyanidrābhistannibadhnāti bhārata
हे भारत, तमस् को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानो; वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।
14.9 सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत
sattvaṃ sukhe saṃjayati rajaḥ karmaṇi bhārata | jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde saṃjayatyuta
हे भारत, सत्त्व सुख में लगाता है, रजस् कर्म में; परन्तु तमस् ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगाता है।
14.10 रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा
rajastamaścābhibhūya sattvaṃ bhavati bhārata | rajaḥ sattvaṃ tamaścaiva tamaḥ sattvaṃ rajastathā
हे भारत, रजस् और तमस् को दबाकर सत्त्व बढ़ता है; सत्त्व और तमस् को दबाकर रजस्; तथा सत्त्व और रजस् को दबाकर तमस् बढ़ता है।
14.11 सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत
sarvadvāreṣu dehe'sminprakāśa upajāyate | jñānaṃ yadā tadā vidyādvivṛddhaṃ sattvamityuta
जब इस देह के सब द्वारों में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्व बढ़ा हुआ है।
14.12 लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ
lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā | rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, रजस् के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा, ये उत्पन्न होते हैं।
14.13 अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन
aprakāśo'pravṛttiśca pramādo moha eva ca | tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana
हे कुरुनन्दन, तमस् के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह, ये उत्पन्न होते हैं।
14.14 यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते
yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṃ yāti dehabhṛt | tadottamavidāṃ lokānamalānpratipadyate
जब सत्त्व बढ़ा हुआ हो और देहधारी मृत्यु को प्राप्त हो, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को पाता है।
14.15 रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते
rajasi pralayaṃ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate | tathā pralīnastamasi mūḍhayoniṣu jāyate
रजस् में मृत्यु होने पर वह कर्मों में आसक्त लोगों में जन्म लेता है; और तमस् में मरने पर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
14.16 कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam | rajasastu phalaṃ duḥkhamajñānaṃ tamasaḥ phalam
शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है; रजस् का फल दुःख है और तमस् का फल अज्ञान।
14.17 सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च
sattvātsaṃjāyate jñānaṃ rajaso lobha eva ca | pramādamohau tamaso bhavato'jñānameva ca
सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजस् से लोभ; और तमस् से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
14.18 ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः
ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ
सत्त्व में स्थित ऊपर के लोकों को जाते हैं, राजस बीच में रहते हैं, और निम्न गुण की वृत्ति में स्थित तामस नीचे जाते हैं।
14.19 नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati | guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so'dhigacchati
जब द्रष्टा गुणों के सिवा किसी को कर्ता नहीं देखता, और गुणों से परे तत्त्व को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।
14.20 गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān | janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnute
देह की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों को पार करके देही जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को प्राप्त होता है।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
14.21 कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते
kairliṅgaistrīnguṇānetānatīto bhavati prabho | kimācāraḥ kathaṃ caitāṃstrīnguṇānativartate
हे प्रभो, इन तीनों गुणों से परे गया पुरुष किन लक्षणों से जाना जाता है? उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है?
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
14.22 प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति
prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava | na dveṣṭi saṃpravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati
हे पाण्डव, जो प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उपस्थित होने पर उनसे द्वेष नहीं करता, और उनके निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता;
14.23 उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate | guṇā vartanta ityeva yo'vatiṣṭhati neṅgate
जो उदासीन की भाँति बैठा हुआ गुणों से विचलित नहीं होता, और 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' यह जानकर स्थिर रहता है, डिगता नहीं;
14.24 समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ
जो सुख-दुःख में सम है, आत्मा में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखता है; प्रिय-अप्रिय को तुल्य मानता है, धीर है, और अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है;
14.25 मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते
mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ | sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate
जो मान-अपमान में सम है, मित्र और शत्रु के पक्ष में सम है, और सब आरम्भों का त्यागी है, वह गुणातीत कहलाता है।
14.26 मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते
māṃ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate | sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate
जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों को पार करके ब्रह्म-भाव के योग्य हो जाता है।
14.27 ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च
brahmaṇo hi pratiṣṭhāhamamṛtasyāvyayasya ca | śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca
क्योंकि अविनाशी अमृत ब्रह्म का, शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं ही हूँ।
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