अध्याय का सार भगवान श्रीकृष्ण प्रेमवश और अर्जुन के हित के लिए फिर से उपदेश देते हैं। देवता और महर्षि भी उनके प्राकट्य को नहीं जानते, क्योंकि वे ही सबके आदि हैं; सप्तर्षि और चार मनु उन्हीं के मन से उत्पन्न हुए। बुद्धि, क्षमा, सत्य से लेकर भय और अभय तक, प्राणियों के सभी भाव उन्हीं से होते हैं। जो भक्त उनमें चित्त लगाकर आपस में उनकी चर्चा करते हैं और उसी में आनंद पाते हैं, उन्हें भगवान बुद्धियोग देते हैं और उनके भीतर ज्ञान का दीपक जलाते हैं। अर्जुन उन्हें परब्रह्म कहते हैं, जैसा नारद, असित, देवल और व्यास ने कहा था, और पूछते हैं कि वे उनका चिंतन कैसे करें। तब भगवान अपनी प्रधान विभूतियाँ बताते हैं: आदित्यों में विष्णु, वेदों में सामवेद, रुद्रों में शंकर, वाणी में ॐ, अचलों में हिमालय, नदियों में गंगा, वृष्णियों में वासुदेव। इनका अंत नहीं है। जो कुछ भी ऐश्वर्यपूर्ण, शोभायुक्त या शक्तिमान है, वह उनके तेज के अंश से उपजा है, और वे इस पूरे जगत को अपने एक अंश से धारण किए हुए हैं।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
10.1 भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया
bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | yatte'haṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā
हे महाबाहो, मेरे परम वचन को फिर से सुनो। तुम इसमें प्रीति रखते हो, इसलिए तुम्हारे हित की इच्छा से मैं इसे कहूँगा।
10.2 न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ | ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ
मेरे प्राकट्य को न देवगण जानते हैं, न महर्षि, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि हूँ।
10.3 यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram | asaṃmūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate
जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोहरहित है और सब पापों से छूट जाता है।
10.4 बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च
buddhirjñānamasaṃmohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ | sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo'bhāvo bhayaṃ cābhayameva ca
बुद्धि, ज्ञान, असंमोह, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का दमन और मन की शांति; सुख और दुःख, उत्पत्ति और विनाश, भय और अभय,
10.5 अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ | bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश: प्राणियों के ये नाना प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
10.6 महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः
maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavastathā | madbhāvā mānasā jātā yeṣāṃ loka imāḥ prajāḥ
पहले के सात महर्षि और चार मनु मेरे भाव से युक्त होकर मेरे मन से उत्पन्न हुए, जिनसे संसार की यह सारी प्रजा है।
10.7 एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ | so'vikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ
जो मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह अविचल योग से मुझमें युक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं।
10.8 अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः
ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate | iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ
मैं ही सबका उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ चलता है। यह जानकर ज्ञानी जन भाव से भरकर मुझे भजते हैं।
10.9 मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च
maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam | kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca
मुझमें चित्त लगाए, मुझमें प्राण अर्पित किए, वे एक-दूसरे को मेरा बोध कराते और सदा मेरी ही चर्चा करते हुए संतुष्ट रहते और आनंद पाते हैं।
10.10 तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते
teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam | dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena māmupayānti te
जो निरंतर मुझसे जुड़े हैं और प्रेमपूर्वक मुझे भजते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।
10.11 तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता
teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ | nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā
उन पर कृपा करने के लिए ही मैं उनके हृदय में स्थित होकर अज्ञान से उपजे अंधकार को ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से नष्ट करता हूँ।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
10.12 परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्
paraṃ brahma paraṃ dhāma pavitraṃ paramaṃ bhavān | puruṣaṃ śāśvataṃ divyamādidevamajaṃ vibhum
आप परब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं; आप शाश्वत दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी हैं।
10.13 आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे
āhustvāmṛṣayaḥ sarve devarṣirnāradastathā | asito devalo vyāsaḥ svayaṃ caiva bravīṣi me
सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास भी आपको ऐसा ही कहते हैं, और अब आप स्वयं भी मुझसे यही कहते हैं।
10.14 सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः
sarvametadṛtaṃ manye yanmāṃ vadasi keśava | na hi te bhagavanvyaktiṃ vidurdevā na dānavāḥ
हे केशव, आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन, आपके स्वरूप को न देवता जानते हैं, न दानव।
10.15 स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते
svayamevātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama | bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate
हे पुरुषोत्तम, हे भूतों को उत्पन्न करने वाले, हे भूतेश, हे देवों के देव, हे जगत्पते, आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।
10.16 वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि
vaktumarhasyaśeṣeṇa divyā hyātmavibhūtayaḥ | yābhirvibhūtibhirlokānimāṃstvaṃ vyāpya tiṣṭhasi
आप अपनी उन दिव्य विभूतियों को पूर्ण रूप से कहिए, जिनके द्वारा आप इन लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं।
10.17 कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया
kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan | keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo'si bhagavanmayā
हे योगेश्वर, मैं निरंतर चिंतन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? हे भगवन, किन-किन भावों में मैं आपका चिंतन करूँ?
10.18 विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana | bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me'mṛtam
हे जनार्दन, अपनी योगशक्ति और विभूति को फिर से विस्तार से कहिए, क्योंकि इस अमृत को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
10.19 हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे
hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ | prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me
अच्छा, हे कुरुश्रेष्ठ, मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियाँ बताऊँगा, पर केवल प्रधान-प्रधान, क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है।
10.20 अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च
ahamātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ | ahamādiśca madhyaṃ ca bhūtānāmanta eva ca
हे गुडाकेश, मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।
10.21 आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी
ādityānāmahaṃ viṣṇurjyotiṣāṃ raviraṃśumān | marīcirmarutāmasmi nakṣatrāṇāmahaṃ śaśī
अदिति के पुत्रों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य। मरुतों में मैं मरीचि हूँ और नक्षत्रों में चंद्रमा।
10.22 वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना
vedānāṃ sāmavedo'smi devānāmasmi vāsavaḥ | indriyāṇāṃ manaścāsmi bhūtānāmasmi cetanā
वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवों में इंद्र। इंद्रियों में मैं मन हूँ और प्राणियों में चेतना।
10.23 रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्
rudrāṇāṃ śaṃkaraścāsmi vitteśo yakṣarakṣasām | vasūnāṃ pāvakaścāsmi meruḥ śikhariṇāmaham
रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्षों और राक्षसों में धन के स्वामी कुबेर। वसुओं में मैं अग्नि हूँ और शिखरों वाले पर्वतों में मेरु।
10.24 पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः
purodhasāṃ ca mukhyaṃ māṃ viddhi pārtha bṛhaspatim | senānīnāmahaṃ skandaḥ sarasāmasmi sāgaraḥ
हे पार्थ, पुरोहितों में मुझे उनका मुखिया बृहस्पति जानो। सेनापतियों में मैं स्कंद हूँ और जलाशयों में समुद्र।
10.25 महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः
maharṣīṇāṃ bhṛgurahaṃ girāmasmyekamakṣaram | yajñānāṃ japayajño'smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर ॐ। यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय।
10.26 अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः
aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ | gandharvāṇāṃ citrarathaḥ siddhānāṃ kapilo muniḥ
सब वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देवर्षियों में नारद। गंधर्वों में मैं चित्ररथ हूँ और सिद्धों में कपिल मुनि।
10.27 उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्
uccaiḥśravasamaśvānāṃ viddhi māmamṛtodbhavam | airāvataṃ gajendrāṇāṃ narāṇāṃ ca narādhipam
घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा मुझे जानो, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा।
10.28 आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः
āyudhānāmahaṃ vajraṃ dhenūnāmasmi kāmadhuk | prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ
शस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में कामधेनु। संतान उत्पन्न करने वालों में मैं कामदेव हूँ और सर्पों में वासुकि।
10.29 अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्
anantaścāsmi nāgānāṃ varuṇo yādasāmaham | pitṝṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṃyamatāmaham
नागों में मैं अनंत (शेषनाग) हूँ, जलचरों में वरुण। पितरों में मैं अर्यमा हूँ और शासन करने वालों में यमराज।
10.30 प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्
prahlādaścāsmi daityānāṃ kālaḥ kalayatāmaham | mṛgāṇāṃ ca mṛgendro'haṃ vainateyaśca pakṣiṇām
दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में काल। पशुओं में मैं सिंह हूँ और पक्षियों में विनता-पुत्र गरुड़।
10.31 पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी
pavanaḥ pavatāmasmi rāmaḥ śastrabhṛtāmaham | jhaṣāṇāṃ makaraścāsmi srotasāmasmi jāhnavī
पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम। जलजीवों में मैं मगर हूँ और नदियों में जाह्नवी गंगा।
10.32 सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्
sargāṇāmādirantaśca madhyaṃ caivāhamarjuna | adhyātmavidyā vidyānāṃ vādaḥ pravadatāmaham
हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य मैं ही हूँ। विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ और वाद करने वालों में तत्त्व-निर्णय के लिए होने वाला वाद।
10.33 अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः
akṣarāṇāmakāro'smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca | ahamevākṣayaḥ kālo dhātāhaṃ viśvatomukhaḥ
अक्षरों में मैं अकार हूँ, समासों में द्वंद्व। मैं ही अक्षय काल हूँ और सब ओर मुख वाला, सबका धारण-पोषण करने वाला मैं ही हूँ।
10.34 मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा
mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām | kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā
मैं सबको हरने वाली मृत्यु हूँ और आगे होने वालों की उत्पत्ति भी। स्त्रीवाचक गुणों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
10.35 बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः
bṛhatsāma tathā sāmnāṃ gāyatrī chandasāmaham | māsānāṃ mārgaśīrṣo'hamṛtūnāṃ kusumākaraḥ
सामगानों में मैं बृहत्साम हूँ, छंदों में गायत्री। महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ और ऋतुओं में फूलों से भरा वसंत।
10.36 द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्
dyūtaṃ chalayatāmasmi tejastejasvināmaham | jayo'smi vyavasāyo'smi sattvaṃ sattvavatāmaham
छल करने वालों में मैं जुआ हूँ, तेजस्वियों का तेज मैं हूँ। मैं विजय हूँ, मैं निश्चय हूँ और सात्त्विक पुरुषों का सत्त्व मैं हूँ।
10.37 वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः
vṛṣṇīnāṃ vāsudevo'smi pāṇḍavānāṃ dhanaṃjayaḥ | munīnāmapyahaṃ vyāsaḥ kavīnāmuśanā kaviḥ
वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पांडवों में धनंजय। मुनियों में मैं व्यास हूँ और कवियों में शुक्राचार्य (उशना)।
10.38 दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्
daṇḍo damayatāmasmi nītirasmi jigīṣatām | maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatāmaham
दमन करने वालों में मैं दंड हूँ, विजय चाहने वालों में नीति। गुप्त रखने योग्य बातों में मैं मौन हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ।
10.39 यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्
yaccāpi sarvabhūtānāṃ bījaṃ tadahamarjuna | na tadasti vinā yatsyānmayā bhūtaṃ carācaram
हे अर्जुन, सब प्राणियों का जो बीज है, वह मैं ही हूँ। चर या अचर ऐसा कोई प्राणी नहीं जो मेरे बिना हो सके।
10.40 नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया
nānto'sti mama divyānāṃ vibhūtīnāṃ parantapa | eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūtervistaro mayā
हे परंतप, मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है। यह विस्तार तो मैंने तुम्हें संक्षेप में ही कहा है।
10.41 यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्
yadyadvibhūtimatsattvaṃ śrīmadūrjitameva vā | tattadevāvagaccha tvaṃ mama tejoṃ'śasaṃbhavam
जो-जो प्राणी विभूतियुक्त, शोभायुक्त या बलशाली है, उस-उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न जानो।
10.42 अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्
athavā bahunaitena kiṃ jñātena tavārjuna | viṣṭabhyāhamidaṃ kṛtsnamekāṃśena sthito jagat
पर हे अर्जुन, इतना बहुत जानने से तुम्हें क्या प्रयोजन? मैं इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।
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