अध्याय का सार आँसुओं से भरे अर्जुन युद्ध से मना करते हैं, और फिर एक नई बात करते हैं: वे श्रीकृष्ण के शिष्य बनकर शरण माँगते हैं। भगवान मुस्कराते हुए उपदेश आरंभ करते हैं। ज्ञानी न जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए। आत्मा न कभी जन्मता है, न मरता है; शस्त्र उसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही देही पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर धारण करता है। फिर भगवान स्वधर्म की बात करते हैं: क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कुछ नहीं, और भागने से अपयश होगा। श्लोक 39 से वे बुद्धियोग बताते हैं। तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में कभी नहीं। समत्व ही योग है; कर्मों में कुशलता ही योग है। अर्जुन पूछते हैं कि स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता, बैठता और चलता है। उत्तर से अध्याय पूरा होता है: वह कछुए की तरह इन्द्रियों को समेट लेता है, और अंत समय में ब्रह्मनिर्वाण पाता है।
संजय ने कहा सञ्जय उवाच
2.1 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः
taṃ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam | viṣīdantamidaṃ vākyamuvāca madhusūdanaḥ
करुणा से भरे, आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले और विषाद करते हुए अर्जुन से मधुसूदन ने यह वचन कहा।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
2.2 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन
kutastvā kaśmalamidaṃ viṣame samupasthitam | anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna
हे अर्जुन, इस संकट की घड़ी में यह मोह तुम्हें कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं, न स्वर्ग देने वाला है, न कीर्ति देने वाला।
2.3 क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप
klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate | kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa
हे पार्थ, कायरता को मत अपनाओ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे परंतप, हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
2.4 कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन
kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṃkhye droṇaṃ ca madhusūdana | iṣubhiḥ prati yotsyāmi pūjārhāvarisūdana
हे मधुसूदन, मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण पर बाणों से कैसे प्रहार करूँ? हे अरिसूदन, वे तो पूजा के योग्य हैं।
2.5 गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्
gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke | hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān
इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से तो इस संसार में भिक्षा माँगकर जीना भी श्रेष्ठ है। इन्हें मारकर जो धन और भोग मिलेंगे, वे भी रक्त से सने होंगे।
2.6 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः
na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ | yāneva hatvā na jijīviṣāma- ste'vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है, हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।
2.7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्
kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasammūḍhacetāḥ | yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme śiṣyaste'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam
कायरता के दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है। मैं आपसे पूछता हूँ, जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।
2.8 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्
na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām | avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam
पृथ्वी का निष्कंटक, समृद्ध राज्य और देवताओं का स्वामित्व पाकर भी मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके।
संजय ने कहा सञ्जय उवाच
2.9 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह
evamuktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ parantapa | na yotsya iti govindamuktvā tūṣṇīṃ babhūva ha
हे राजन्, हृषीकेश से ऐसा कहकर परंतप गुडाकेश अर्जुन ने गोविन्द से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और चुप हो गए।
2.10 तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः
tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata | senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ
हे भारत, तब दोनों सेनाओं के बीच शोक करते हुए अर्जुन से हृषीकेश ने मानो मुस्कराते हुए यह वचन कहा।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
2.11 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase | gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ
तुम उनके लिए शोक करते हो जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, और फिर भी ज्ञान की बातें करते हो। ज्ञानी न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।
2.12 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्
na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ | na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param
ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे। और न ऐसा होगा कि आगे हम सब नहीं रहेंगे।
2.13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā | tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati
जैसे देही इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा पाता है, वैसे ही दूसरा शरीर पाता है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
2.14 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत
mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ | āgamāpāyino'nityāstāṃstitikṣasva bhārata
हे कौन्तेय, इन्द्रियों और विषयों के संयोग से सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख होते हैं। ये आते-जाते हैं और अनित्य हैं। हे भारत, इन्हें सहन करो।
2.15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha | samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpate
हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर पुरुष को ये विचलित नहीं करते, जो सुख-दुःख में समान रहता है, वह अमृतत्व का अधिकारी होता है।
2.16 नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥ
असत् का अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों का अंतिम सत्य देख लिया है।
2.17 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति
avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam | vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati
जिससे यह सब व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अविनाशी का नाश कोई नहीं कर सकता।
2.18 अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत
antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ | anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata
नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, युद्ध करो।
2.19 य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते
ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate
जो आत्मा को मारने वाला समझता है और जो उसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।
2.20 न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे
na jāyate mriyate vā kadācinnāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre
यह आत्मा न कभी जन्मता है, न कभी मरता है। यह एक बार होकर फिर मिट जाने वाला नहीं है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
2.21 वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam | kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam
हे पार्थ, जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसी को मरवाए या किसे मारे?
2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇānyanyāni saṃyāti navāni dehī
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही देही पुराने शरीर त्यागकर नए शरीर धारण करता है।
2.23 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः
nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ | na cainaṃ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ
इसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि नहीं जलाती, जल नहीं गलाता और वायु नहीं सुखाती।
2.24 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः
acchedyo'yamadāhyo'yamakledyo'śoṣya eva ca | nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo'yaṃ sanātanaḥ
यह आत्मा न कटने वाला, न जलने वाला, न गलने वाला और न सूखने वाला है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
2.25 अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि
avyakto'yamacintyo'yamavikāryo'yamucyate | tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi
यह अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित कहा जाता है। इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
2.26 अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि
atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitumarhasi
और हे महाबाहो, यदि तुम इसे सदा जन्मने और सदा मरने वाला भी मानो, तब भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
2.27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca | tasmādaparihārye'rthe na tvaṃ śocitumarhasi
क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए जो टल नहीं सकता, उसके लिए शोक मत करो।
2.28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata | avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā
हे भारत, सभी प्राणी आरंभ में अव्यक्त, बीच में व्यक्त और अंत में फिर अव्यक्त हो जाते हैं। फिर इसमें शोक कैसा?
2.29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्
āścaryavatpaśyati kaścidenamāścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ | āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti śrutvāpyenaṃ veda na caiva kaścit
कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह इसका वर्णन करता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है, और सुनकर भी कोई इसे नहीं जानता।
2.30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि
dehī nityamavadhyo'yaṃ dehe sarvasya bhārata | tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi
हे भारत, सबके शरीर में रहने वाला यह देही नित्य और अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
2.31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi | dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate
अपने स्वधर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कुछ नहीं है।
2.32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्
yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam | sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam
हे पार्थ, अपने आप आया हुआ, खुले स्वर्गद्वार के समान ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।
2.33 अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि
atha cettvamimaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi | tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpamavāpsyasi
किन्तु यदि तुम यह धर्मयुद्ध नहीं करोगे, तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे।
2.34 अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते
akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te'vyayām | sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate
लोग सदा तुम्हारे अपयश की चर्चा करेंगे, और सम्मानित पुरुष के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।
2.35 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्
bhayādraṇāduparataṃ maṃsyante tvāṃ mahārathāḥ | yeṣāṃ ca tvaṃ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam
महारथी समझेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से हट गए, और जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित थे, उनकी दृष्टि में तुम छोटे हो जाओगे।
2.36 अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्
avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ | nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim
तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत सी न कहने योग्य बातें कहेंगे। इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
2.37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः
hato vā prāpsyasi svargaṃ jitvā vā bhokṣyase mahīm | tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ
यदि मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, और जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय, युद्ध का निश्चय करके खड़े हो जाओ।
2.38 सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau | tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi
सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर युद्ध में लग जाओ। इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
2.39 एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि
eṣā te'bhihitā sāṃkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu | buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi
हे पार्थ, यह बुद्धि तुम्हें सांख्य के अनुसार बताई गई। अब इसे योग के अनुसार सुनो, जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मबंधन को तोड़ दोगे।
2.40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्
nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate | svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt
इस मार्ग में आरंभ किए प्रयत्न का नाश नहीं होता और उलटा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा पालन भी महान भय से रक्षा करता है।
2.41 व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्
vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana | bahuśākhā hyanantāśca buddhayo'vyavasāyinām
हे कुरुनन्दन, इस मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है। अस्थिर विचार वालों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनंत होती हैं।
2.42 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः
yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ | vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ
हे पार्थ, जो अविवेकी लोग वेदों के कर्मकाण्ड वाले वचनों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि इसके आगे कुछ नहीं है, वे दिखावटी, फूलों जैसी वाणी बोलते हैं,
2.43 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām | kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati
वे कामनाओं से भरे, स्वर्ग को ही परम मानने वाले हैं, और उनकी वाणी जन्म रूपी कर्मफल देने वाली, भोग और ऐश्वर्य के लिए अनेक विशेष क्रियाओं से भरी होती है।
2.44 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate
उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में आसक्त हैं, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।
2.45 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्
traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna | nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān
वेद तीनों गुणों के विषयों का वर्णन करते हैं। हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो: द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, योग-क्षेम की चिंता से मुक्त और आत्मनिष्ठ बनो।
2.46 यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः
yāvānartha udapāne sarvataḥ saṃplutodake | tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ
चारों ओर से जल से भरे जलाशय के मिल जाने पर छोटे जलाशय का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण के लिए सब वेदों का उतना ही प्रयोजन रहता है।
2.47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि
karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo'stvakarmaṇi
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। कर्मफल को अपना हेतु मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
2.48 योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanaṃjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate
हे धनंजय, आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म करो। यह समत्व ही योग कहलाता है।
2.49 दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanaṃjaya | buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ
हे धनंजय, बुद्धियोग की तुलना में फल की इच्छा से किया गया कर्म बहुत निम्न है। तुम बुद्धि की शरण लो। फल की इच्छा रखने वाले दीन हैं।
2.50 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्
buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam
बुद्धि से युक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लग जाओ। कर्मों में कुशलता ही योग है।
2.51 कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्
karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ | janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam
बुद्धियुक्त ज्ञानी कर्म से उत्पन्न फल को त्यागकर जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और निर्दोष, दुःखरहित परमपद को पाते हैं।
2.52 यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च
yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati | tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca
जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर लेगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सब विषयों से वैराग्य पा लोगे।
2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā | samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi
अनेक प्रकार के वचनों को सुनकर विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब समाधि में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
2.54 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava | sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim
हे केशव, समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
2.55 प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते
prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān | ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate
हे पार्थ, जब मनुष्य मन की सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
2.56 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ | vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate
दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी लालसा नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
2.57 यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā
जो सर्वत्र आसक्तिरहित है, जो शुभ पाकर प्रसन्न नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.58 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā
जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
2.59 विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate
विषयों को ग्रहण न करने वाले देही से विषय तो दूर हो जाते हैं, पर उनमें रस बना रहता है। परमात्मा का दर्शन होने पर वह रस भी छूट जाता है।
2.60 यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः
yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ
हे कौन्तेय, प्रयत्न करते हुए विवेकी पुरुष के मन को भी ये प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
2.61 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta matparaḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā
इन सब इन्द्रियों को वश में करके, मेरे परायण होकर, योग में स्थित रहना चाहिए। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.62 ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते
dhyāyato viṣayānpuṃsaḥ saṅgasteṣūpajāyate | saṅgātsaṃjāyate kāmaḥ kāmātkrodho'bhijāyate
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, और कामना से क्रोध पैदा होता है।
2.63 क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति
krodhādbhavati saṃmohaḥ saṃmohātsmṛtivibhramaḥ | smṛtibhraṃśādbuddhināśo buddhināśātpraṇaśyati
क्रोध से मोह होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।
2.64 रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति
rāgadveṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran | ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati
परन्तु जिसका अन्तःकरण वश में है, वह राग-द्वेष से रहित और अपने वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों में विचरता हुआ प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
2.65 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate | prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate
उस प्रसन्नता में उसके सब दुःख नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
2.66 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्
nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā | na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham
जो योग में युक्त नहीं, उसमें निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती और न भावना होती है। भावना के बिना शांति नहीं, और अशांत को सुख कहाँ?
2.67 इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि
indriyāṇāṃ hi caratāṃ yanmano'nu vidhīyate | tadasya harati prajñāṃ vāyurnāvamivāmbhasi
जैसे जल में चलती नाव को वायु हर ले जाती है, वैसे ही विषयों में विचरती इन्द्रियों में से जिसके पीछे मन लग जाता है, वह इन्द्रिय उसकी बुद्धि को हर लेती है।
2.68 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā
इसलिए हे महाबाहो, जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से सब प्रकार वश में की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.69 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः
yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī | yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ
जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।
2.70 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat | tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī
जैसे नदियों का जल सब ओर से भरे हुए, अचल मर्यादा वाले समुद्र में आकर समा जाता है, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ समा जाती हैं, वही शांति पाता है, कामनाओं को चाहने वाला नहीं।
2.71 विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति
vihāya kāmānyaḥ sarvān pumāṃścarati niḥspṛhaḥ | nirmamo nirahaṃkāraḥ sa śāntimadhigacchati
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर, लालसा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वह शांति पाता है।
2.72 एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति
eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati | sthitvāsyāmantakāle'pi brahmanirvāṇamṛcchati
हे पार्थ, यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अंत समय में भी इसमें स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।
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