अध्याय का सार अर्जुन संन्यास और त्याग का भेद पूछते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप कभी नहीं छोड़ने चाहिए, क्योंकि ये बुद्धिमानों को भी पवित्र करते हैं; छोड़ना है आसक्ति और फल की इच्छा को। हर कर्म के पीछे पाँच कारण हैं: अधिष्ठान, कर्ता, करण, अनेक चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव। जो केवल आत्मा को कर्ता मानता है, वह ठीक नहीं देखता। ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख, सब तीन गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं, और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों से बताए गए हैं। अपने कर्म से भगवान की पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है; गुणरहित स्वधर्म भी भली-भाँति आचरित परधर्म से श्रेष्ठ है। फिर भगवान अपना सबसे गुप्त वचन कहते हैं: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। अर्जुन कहते हैं, मेरा मोह नष्ट हो गया, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। व्यासजी की कृपा से यह सब सुनने वाले संजय कहते हैं: जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है।
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
18.1 संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन
saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum | tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana
हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
18.2 काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः
kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ | sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ
कवि (ज्ञानी) काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं, और विचारशील लोग सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
18.3 त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे
tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ | yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare
कुछ मनीषी कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त है, इसलिए त्याग देना चाहिए; और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।
18.4 निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः
niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama | tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। हे पुरुषसिंह, त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।
18.5 यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्
yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat | yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām
यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, इन्हें करना ही चाहिए। यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले हैं।
18.6 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्
etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca | kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam
परन्तु इन कर्मों को भी आसक्ति और फल का त्याग करके करना चाहिए। हे पार्थ, यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
18.7 नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः
niyatasya tu saṃnyāsaḥ karmaṇo nopapadyate | mohāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ
नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग तामसी त्याग कहा गया है।
18.8 दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्
duḥkhamityeva yatkarma kāyakleśabhayāttyajet | sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet
जो कर्म को दुःखरूप समझकर शरीर के कष्ट के भय से छोड़ देता है, वह राजसी त्याग करके त्याग का फल नहीं पाता।
18.9 कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः
kāryamityeva yatkarma niyataṃ kriyate'rjuna | saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ
हे अर्जुन, जो नियत कर्म 'यह करना ही कर्तव्य है' ऐसा मानकर, आसक्ति और फल को छोड़कर किया जाता है, वह त्याग सात्त्विक माना गया है।
18.10 न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः
na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate | tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ
सत्त्वगुण से युक्त, मेधावी और संशयरहित त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है, न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।
18.11 न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते
na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ | yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyate
देहधारी के लिए कर्मों को पूरी तरह त्यागना सम्भव नहीं है; परन्तु जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी कहलाता है।
18.12 अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्
aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam | bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit
अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित, ये तीन प्रकार के कर्मफल त्याग न करने वालों को मरने के बाद मिलते हैं, परन्तु संन्यासियों को कभी नहीं।
18.13 पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्
pañcaitāni mahābāho kāraṇāni nibodha me | sāṃkhye kṛtānte proktāni siddhaye sarvakarmaṇām
हे महाबाहो, सब कर्मों की सिद्धि के ये पाँच कारण, जो सांख्य सिद्धान्त में बताए गए हैं, मुझसे जानो।
18.14 अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham | vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam
अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, भिन्न-भिन्न करण, अनेक प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव।
18.15 शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः
śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ | nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ
मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, चाहे उचित हो या विपरीत, उसके ये पाँच ही कारण हैं।
18.16 तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः
tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ | paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ
ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि के कारण केवल आत्मा को कर्ता देखता है, वह दुर्मति ठीक नहीं देखता।
18.17 यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate | hatvāpi sa imā~llokānna hanti na nibadhyate
जिसमें 'मैं कर्ता हूँ' यह भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है।
18.18 ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः
jñānaṃ jñeyaṃ parijñātā trividhā karmacodanā | karaṇaṃ karma karteti trividhaḥ karmasaṃgrahaḥ
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं; और करण, कर्म और कर्ता, ये तीन कर्म के आधार हैं।
18.19 ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि
jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ | procyate guṇasaṃkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi
गुणों का वर्णन करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। उन्हें भी यथावत् सुनो।
18.20 सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्
sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate | avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam
जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक ही अविनाशी भाव को, बँटे हुओं में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।
18.21 पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्
pṛthaktvena tu yajjñānaṃ nānābhāvānpṛthagvidhān | vetti sarveṣu bhūteṣu tajjñānaṃ viddhi rājasam
परन्तु जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के अनेक भावों को पृथक् रूप से जानता है, उस ज्ञान को राजसी जानो।
18.22 यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्
yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam | atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam
और जो ज्ञान एक ही कार्य में उसे ही सब कुछ मानकर आसक्त रहता है, बिना युक्ति का, तत्त्व के अर्थ से रहित और तुच्छ है, वह तामसी कहा गया है।
18.23 नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते
niyataṃ saṅgarahitamarāgadveṣataḥ kṛtam | aphalaprepsunā karma yattatsāttvikamucyate
जो नियत कर्म आसक्ति के बिना, राग-द्वेष के बिना, फल न चाहने वाले द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है।
18.24 यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्
yattu kāmepsunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ | kriyate bahulāyāsaṃ tadrājasamudāhṛtam
परन्तु जो कर्म कामना चाहने वाले द्वारा, या अहंकार के साथ, बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजसी कहा गया है।
18.25 अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते
anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanavekṣya ca pauruṣam | mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य को न देखकर मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामसी कहलाता है।
18.26 मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते
muktasaṅgo'nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ | siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार की बात नहीं करता, धैर्य और उत्साह से युक्त है और सिद्धि-असिद्धि में विकार रहित रहता है, वह सात्त्विक कहलाता है।
18.27 रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः
rāgī karmaphalaprepsurlubdho hiṃsātmako'śuciḥ | harṣaśokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ
जो कर्ता रागी है, कर्मफल चाहता है, लोभी है, हिंसा के स्वभाव वाला है, अशुद्ध है और हर्ष-शोक से भरा रहता है, वह राजसी कहा गया है।
18.28 अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko'lasaḥ | viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate
जो कर्ता अयुक्त, असंस्कृत, अकड़ा हुआ, धूर्त, दूसरों की जीविका बिगाड़ने वाला, आलसी, विषादी और काम को टालने वाला है, वह तामसी कहलाता है।
18.29 बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय
buddherbhedaṃ dhṛteścaiva guṇatastrividhaṃ śṛṇu | procyamānamaśeṣeṇa pṛthaktvena dhanaṃjaya
हे धनञ्जय, अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के तीन-तीन भेद पूरी तरह और अलग-अलग सुनो।
18.30 प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye | bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī
हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय, तथा बन्धन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विक है।
18.31 यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी
yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca | ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī
हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक-ठीक नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
18.32 अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी
adharmaṃ dharmamiti yā manyate tamasāvṛtā | sarvārthānviparītāṃśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī
हे पार्थ, जो बुद्धि तमोगुण से ढकी होकर अधर्म को धर्म मानती है और सब बातों को उलटा देखती है, वह बुद्धि तामसी है।
18.33 धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी
dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ | yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī
हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विक है।
18.34 यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी
yayā tu dharmakāmārthāndhṛtyā dhārayate'rjuna | prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī
परन्तु हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य आसक्ति के कारण फल चाहते हुए धर्म, काम और अर्थ को पकड़े रहता है, हे पार्थ, वह धृति राजसी है।
18.35 यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी
yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madameva ca | na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī
हे पार्थ, जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
18.36 सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति
sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha | abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati
हे भरतश्रेष्ठ, अब तीन प्रकार के सुख के विषय में भी मुझसे सुनो: जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है और दुःखों के अन्त को पहुँचता है,
18.37 यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्
yattadagre viṣamiva pariṇāme'mṛtopamam | tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam
जो आरम्भ में विष जैसा और परिणाम में अमृत जैसा है, जो आत्मा-विषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
18.38 विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्
viṣayendriyasaṃyogādyattadagre'mṛtopamam | pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam
जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होता है, आरम्भ में अमृत जैसा और परिणाम में विष जैसा, वह राजसी माना गया है।
18.39 यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्
yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ | nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam
जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, और निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामसी कहा गया है।
18.40 न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ | sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ
पृथ्वी पर, या स्वर्ग में देवताओं में भी, ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
18.41 ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः
brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca parantapa | karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ
हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।
18.42 शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्
śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca | jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam
शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता, ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
18.43 शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्
śauryaṃ tejo dhṛtirdākṣyaṃ yuddhe cāpyapalāyanam | dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṃ karma svabhāvajam
शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध से न भागना, दान और स्वामिभाव, ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
18.44 कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्
kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam | paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam
खेती, गोरक्षा और व्यापार वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं, और सेवा का कर्म शूद्र के स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
18.45 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ | svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu
अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा मनुष्य किस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
18.46 यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः
yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam | svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ
जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
18.47 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt | svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam
अच्छी प्रकार आचरित परधर्म से गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
18.48 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः
sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet | sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ
हे कौन्तेय, दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जैसे धुएँ से अग्नि ढकी रहती है, वैसे ही सब कर्म किसी न किसी दोष से ढके हैं।
18.49 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ | naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati
जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो स्पृहा से रहित है, वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य की परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
18.50 सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा
siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me | samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā
हे कौन्तेय, सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को पाता है, जो ज्ञान की परम निष्ठा है, वह मुझसे संक्षेप में जानो।
18.51 बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च
buddhyā viśuddhyā yukto dhṛtyātmānaṃ niyamya ca | śabdādīnviṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति से मन को वश में करके, शब्द आदि विषयों को त्यागकर और राग-द्वेष को दूर करके,
18.52 विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ | dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ
एकान्त में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, सदा ध्यानयोग में लगा हुआ और वैराग्य का आश्रय लेने वाला,
18.53 अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते
ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ parigraham | vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate
अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शान्त होकर वह ब्रह्म से एक होने के योग्य हो जाता है।
18.54 ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati | samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām
ब्रह्मभाव को प्राप्त, प्रसन्न मन वाला वह न शोक करता है, न कुछ चाहता है। सब प्राणियों में समभाव रखकर वह मेरी परा भक्ति को पाता है।
18.55 भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्
bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ | tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram
भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जानता है कि मैं कितना हूँ और कौन हूँ। फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश कर जाता है।
18.56 सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्
sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ | matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam
मेरा आश्रय लेने वाला मनुष्य सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत, अविनाशी पद को प्राप्त होता है।
18.57 चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव
cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ | buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava
मन से सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मुझे ही परम मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्त लगाए रहो।
18.58 मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi | atha cettvamahaṃkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi
मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से सब संकटों को पार कर जाओगे। परन्तु यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।
18.59 यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति
yadahaṃkāramāśritya na yotsya iti manyase | mithyaiṣa vyavasāyaste prakṛtistvāṃ niyokṣyati
यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम यह मानते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या है; तुम्हारी प्रकृति तुम्हें युद्ध में लगा देगी।
18.60 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्
svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā | kartuṃ necchasi yanmohātkariṣyasyavaśo'pi tat
हे कौन्तेय, अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हुए तुम, जिसे मोह के कारण करना नहीं चाहते, उसे भी विवश होकर करोगे।
18.61 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया
īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ hṛddeśe'rjuna tiṣṭhati | bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā
हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से सब प्राणियों को ऐसे घुमा रहा है मानो वे किसी यन्त्र पर चढ़े हों।
18.62 तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्
tameva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata | tatprasādātparāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam
हे भारत, तुम सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति और शाश्वत धाम को प्राप्त करोगे।
18.63 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु
iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā | vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru
इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी गुप्त ज्ञान कहा। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहो वैसा करो।
18.64 सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्
sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | iṣṭo'si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam
सबसे गुप्त मेरा परम वचन फिर से सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगा।
18.65 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru | māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo'si me
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे, यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।
18.66 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः
sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja | ahaṃ tvāṃ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
18.67 इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति
idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana | na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo'bhyasūyati
यह ज्ञान कभी भी तपरहित को, भक्तिरहित को, सुनने की इच्छा न रखने वाले को, और मुझमें दोष देखने वाले को नहीं कहना चाहिए।
18.68 य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः
ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣvabhidhāsyati | bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā māmevaiṣyatyasaṃśayaḥ
जो मुझमें परा भक्ति करके इस परम गुप्त ज्ञान को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
18.69 न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि
na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścinme priyakṛttamaḥ | bhavitā na ca me tasmādanyaḥ priyataro bhuvi
मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय कोई दूसरा नहीं होगा।
18.70 अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः
adhyeṣyate ca ya imaṃ dharmyaṃ saṃvādamāvayoḥ | jñānayajñena tenāhamiṣṭaḥ syāmiti me matiḥ
और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है।
18.71 श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्
śraddhāvānanasūyaśca śṛṇuyādapi yo naraḥ | so'pi muktaḥ śubhā~llokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām
और जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोषदृष्टि छोड़कर इसे केवल सुनेगा भी, वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
18.72 कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय
kaccidetacchrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā | kaccidajñānasaṃmohaḥ pranaṣṭaste dhanaṃjaya
हे पार्थ, क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?
अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच
18.73 नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव
naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta | sthito'smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava
हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई। मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
संजय ने कहा सञ्जय उवाच
18.74 इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्
ityahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ | saṃvādamimamaśrauṣamadbhutaṃ romaharṣaṇam
इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत, रोमांचित कर देने वाला संवाद सुना।
18.75 व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्
vyāsaprasādācchrutavānetadguhyamahaṃ param | yogaṃ yogeśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam
श्रीव्यासजी की कृपा से मैंने यह परम गुप्त योग स्वयं कहते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना।
18.76 राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः
rājansaṃsmṛtya saṃsmṛtya saṃvādamimamadbhutam | keśavārjunayoḥ puṇyaṃ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ
हे राजन्, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्य संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
18.77 तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः
tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ | vismayo me mahān rājanhṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ
और हे राजन्, श्रीहरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके मुझे महान विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
18.78 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम
yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ | tatra śrīrvijayo bhūtirdhruvā nītirmatirmama
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
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