अध्याय 4

ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — ज्ञान और कर्म-संन्यास का योग

42 श्लोक

अध्याय का सार

श्रीकृष्ण इस योग की परम्परा से आरम्भ करते हैं। उन्होंने यह सूर्यदेव विवस्वान को दिया, विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, और राजर्षि इसे जानते रहे, जब तक लम्बे काल में यह लुप्त न हो गया। अर्जुन पूछते हैं कि अभी जन्मे आप सूर्य को उपदेश कैसे दे सकते थे। भगवान कहते हैं कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म हो चुके हैं। वे सब जानते हैं, अर्जुन नहीं जानते। अजन्मा और अविनाशी होकर भी वे अपनी माया से प्रकट होते हैं, जब-जब धर्म की हानि होती है, साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए, युग-युग में। फिर उपदेश कर्म की ओर मुड़ता है। कर्म क्या है और अकर्म क्या, इसमें ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं। जो कर्म में अकर्म देखता है, जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जल गए हैं, वह कभी नहीं बँधता। द्रव्य से लेकर प्राणायाम तक अनेक यज्ञ गिनाए जाते हैं, और ज्ञानयज्ञ को सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है। वह ज्ञान तत्त्वदर्शी ज्ञानियों से प्रणाम, प्रश्न और सेवा द्वारा प्राप्त करो। अध्याय एक आज्ञा पर समाप्त होता है: ज्ञान की तलवार से संशय काटो और उठ खड़े हो।

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

4.1

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam |
vivasvānmanave prāha manurikṣvākave'bravīt

यह अविनाशी योग मैंने सूर्यदेव विवस्वान को कहा था। विवस्वान ने इसे मनु को बताया और मनु ने इक्ष्वाकु को।

4.2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ |
sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना। परन्तु हे परन्तप, बहुत समय बीतने से यह योग इस लोक में लुप्त हो गया।

4.3

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

sa evāyaṃ mayā te'dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ |
bhakto'si me sakhā ceti rahasyaṃ hyetaduttamam

वही पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मेरे सखा हो। यह उत्तम रहस्य है।

अर्जुन ने कहा अर्जुन उवाच

4.4

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति

aparaṃ bhavato janma paraṃ janma vivasvataḥ |
kathametadvijānīyāṃ tvamādau proktavāniti

आपका जन्म तो बाद का है और विवस्वान का जन्म पहले का। तब मैं कैसे समझूँ कि आपने ही आरम्भ में यह योग कहा था?

श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच

4.5

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप

bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna |
tānyahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa

हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म बीत चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, हे परन्तप, तुम नहीं जानते।

4.6

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया

ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san |
prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā

मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

4.7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |
abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjāmyaham

हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं अपने को प्रकट करता हूँ।

4.8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām |
dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भाँति स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

4.9

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन

janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ |
tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti māmeti so'rjuna

हे अर्जुन, जो मेरे दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़कर फिर जन्म नहीं लेता, वह मुझे ही प्राप्त होता है।

4.10

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः

vītarāgabhayakrodhā manmayā māmupāśritāḥ |
bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥ

राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय, मेरे आश्रित, ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

4.11

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

ye yathā māṃ prapadyante tāṃstathaiva bhajāmyaham |
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ

जो मुझे जिस भाव से भजते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार भजता हूँ। हे पार्थ, सब मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

4.12

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ |
kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā

कर्मों की सिद्धि चाहने वाले लोग यहाँ देवताओं का पूजन करते हैं, क्योंकि मनुष्य-लोक में कर्म से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र मिलती है।

4.13

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्

cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ |
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam

गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्णों की रचना मैंने की है। उनका कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को तुम अकर्ता ही जानो।

4.14

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते

na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā |
iti māṃ yo'bhijānāti karmabhirna sa badhyate

कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और कर्मफल में मेरी कोई इच्छा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।

4.15

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

evaṃ jñātvā kṛtaṃ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ |
kuru karmaiva tasmāttvaṃ pūrvaiḥ pūrvataraṃ kṛtam

ऐसा जानकर पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी कर्म किए। इसलिए तुम भी वैसे ही कर्म करो, जैसे पूर्वजों ने बहुत पहले से किए हैं।

4.16

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

kiṃ karma kimakarmeti kavayo'pyatra mohitāḥ |
tatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase'śubhāt

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसमें विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का तत्त्व बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।

4.17

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

karmaṇo hyapi boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ |
akarmaṇaśca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ

कर्म का स्वरूप जानना चाहिए, विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है।

4.18

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्

karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ |
sa buddhimānmanuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt

जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।

4.19

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः

yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṃkalpavarjitāḥ |
jñānāgnidagdhakarmāṇaṃ tamāhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ

जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, जिसके कर्म ज्ञानरूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।

4.20

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः

tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ |
karmaṇyabhipravṛtto'pi naiva kiṃcitkaroti saḥ

कर्मफल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी आश्रय पर निर्भर न रहने वाला मनुष्य कर्म में भली-भाँति लगा हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

4.21

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ |
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam

आशा से रहित, मन और शरीर को वश में रखने वाला, सब प्रकार के संग्रह को त्याग देने वाला मनुष्य केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता।

4.22

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते

yadṛcchālābhasaṃtuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ |
samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate

जो अपने-आप मिले उसमें सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से परे, ईर्ष्या से रहित, सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला मनुष्य कर्म करके भी नहीं बँधता।

4.23

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते

gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ |
yajñāyācarataḥ karma samagraṃ pravilīyate

जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, जो केवल यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।

4.24

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना

brahmārpaṇaṃ brahma havirbrahmāgnau brahmaṇā hutam |
brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā

अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी कर्ता द्वारा ब्रह्मरूपी अग्नि में आहुति दी जाती है। जो कर्म में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।

4.25

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति

daivamevāpare yajñaṃ yoginaḥ paryupāsate |
brahmāgnāvapare yajñaṃ yajñenaivopajuhvati

कुछ योगी देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही अनुष्ठान करते हैं, और कुछ ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।

4.26

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति

śrotrādīnīndriyāṇyanye saṃyamāgniṣu juhvati |
śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati

कुछ लोग श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नियों में हवन करते हैं, और कुछ शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नियों में हवन करते हैं।

4.27

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते

sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare |
ātmasaṃyamayogāgnau juhvati jñānadīpite

कुछ लोग सब इन्द्रियों के कर्मों और प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयमरूपी योग की अग्नि में हवन करते हैं।

4.28

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः

dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare |
svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṃśitavratāḥ

कुछ लोग द्रव्ययज्ञ करते हैं, कुछ तपयज्ञ, कुछ योगयज्ञ, और कठोर व्रत वाले प्रयत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करते हैं।

4.29

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः

apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe'pānaṃ tathāpare |
prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ

कुछ लोग अपान में प्राण का और प्राण में अपान का हवन करते हैं, और प्राण तथा अपान की गति रोककर प्राणायाम में तत्पर रहते हैं।

4.30

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati |
sarve'pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ

कुछ लोग नियमित आहार करते हुए प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं और यज्ञ से इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।

4.31

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम

yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam |
nāyaṃ loko'styayajñasya kuto'nyaḥ kurusattama

यज्ञ से बचे अमृत का भोजन करने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता उसके लिए यह लोक भी सुखदायक नहीं, फिर परलोक कैसे होगा?

4.32

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे

evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe |
karmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase

इस प्रकार बहुत से यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो। ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

4.33

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते

śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa |
sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate

हे परन्तप, द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ, सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में जाकर समाप्त होते हैं।

4.34

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः

tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |
upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ

उस ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझो। उन्हें दण्डवत प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और निष्कपट भाव से प्रश्न करने से वे तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।

4.35

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि

yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava |
yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi

हे पाण्डव, उसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगे, और उससे तुम सम्पूर्ण प्राणियों को अपने में और फिर मुझमें देखोगे।

4.36

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि

api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ |
sarvaṃ jñānaplavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi

यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका से तुम सम्पूर्ण पापों को निःसन्देह पार कर जाओगे।

4.37

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा

yathaidhāṃsi samiddho'gnirbhasmasātkurute'rjuna |
jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurute tathā

हे अर्जुन, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।

4.38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate |
tatsvayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर उसे अपने भीतर ही पा लेता है।

4.39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति

śraddhāvāṃllabhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ |
jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntimacireṇādhigacchati

श्रद्धावान, तत्पर और जितेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

4.40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः

ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati |
nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशय से भरा मनुष्य नष्ट हो जाता है। संशयी के लिए न यह लोक है, न परलोक, न ही सुख।

4.41

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय

yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasaṃchinnasaṃśayam |
ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanaṃjaya

हे धनञ्जय, जिसने योग द्वारा कर्मों का संन्यास कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं, ऐसे आत्मवान पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।

4.42

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत

tasmādajñānasambhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinātmanaḥ |
chittvainaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārata

इसलिए हे भारत, अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ और उठ खड़े हो।