अध्याय का सार श्रीकृष्ण शरीर को क्षेत्र कहते हैं और उसे जानने वाले को क्षेत्रज्ञ। फिर स्पष्ट कहते हैं कि सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ, और इन दोनों का भेद जानना ही सच्चा ज्ञान है। क्षेत्र किससे बना है, यह वे गिनाते हैं: पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ और मन, इन्द्रियों के विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि। ज्ञान मनुष्य में कैसा दिखता है, यह भी बताते हैं: मान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, गुरु की सेवा, शुद्धि, उनमें अनन्य भक्ति और एकान्त में रहने की रुचि। फिर जानने योग्य ब्रह्म का वर्णन है, जो अनादि है, जिसके हाथ-पैर और नेत्र सब ओर हैं, जो इन्द्रियों से रहित होकर भी उन्हें प्रकाशित करता है। प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं; करना प्रकृति का है, भोगना पुरुष का। जो परमेश्वर को सब प्राणियों में समान रूप से स्थित और आकाश की भाँति निर्लिप्त देखता है, वही ठीक देखता है और परम गति पाता है।
श्रीभगवान ने कहा श्रीभगवानुवाच
13.1 इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate | etadyo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ
हे कौन्तेय, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है। जो इसे जानता है, उसे तत्त्व के जानकार क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
13.2 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम
kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata | kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama
हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।
13.3 तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु
tatkṣetraṃ yacca yādṛkca yadvikāri yataśca yat | sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu
वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, किन विकारों वाला है और किससे उत्पन्न हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है, यह संक्षेप में मुझसे सुनो।
13.4 ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः
ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak | brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ
ऋषियों ने इसे अनेक प्रकार से, विविध छन्दों में अलग-अलग गाया है, और ब्रह्मसूत्र के पदों में भी युक्तियों सहित निश्चय करके कहा गया है।
13.5 महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः
mahābhūtānyahaṃkāro buddhiravyaktameva ca | indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त प्रकृति; दस इन्द्रियाँ और एक मन; तथा इन्द्रियों के पाँच विषय;
13.6 इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्
icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṃghātaścetanā dhṛtiḥ | etatkṣetraṃ samāsena savikāramudāhṛtam
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का समूह, चेतना और धृति; यह विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।
13.7 अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः
amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam | ācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyamātmavinigrahaḥ
मान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, पवित्रता, स्थिरता और मन का संयम;
13.8 इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्
indriyārtheṣu vairāgyamanahaṃkāra eva ca | janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam
इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में दुःख और दोष को बार-बार देखना;
13.9 असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu | nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu
आसक्ति का अभाव, पुत्र, पत्नी, घर आदि में ममता न रखना, और प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम रहना;
13.10 मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि
mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī | viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi
मुझमें अनन्य योग से अटल भक्ति, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और लोगों की भीड़ में रुचि न होना;
13.11 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा
adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam | etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato'nyathā
अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य को सदा सामने रखना; यह ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है वह अज्ञान है।
13.12 ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते
jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi yajjñātvāmṛtamaśnute | anādi matparaṃ brahma na sattannāsaducyate
जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमृत पाता है, वह मैं कहूँगा: वह अनादि परब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जाता है, न असत्।
13.13 सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति
sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato'kṣiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati
उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं, कान भी संसार में सब ओर हैं; वह सबको व्याप्त करके स्थित है।
13.14 सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam | asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca
वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करता है, फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति-रहित होकर भी सबका धारण-पोषण करता है; निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता है।
13.15 बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्
bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca | sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat
वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी, चर भी है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह इन्द्रियों द्वारा जाना नहीं जाता; वह दूर भी है और समीप भी।
13.16 अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam | bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca
वह अविभक्त होकर भी प्राणियों में विभक्त-सा स्थित है। उसे प्राणियों का पालनकर्ता जानो; वही उनका संहार करता है और वही उन्हें उत्पन्न करता है।
13.17 ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्
jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate | jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam
वह ज्योतियों की भी ज्योति है, अन्धकार से परे कहा गया है। वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में विराजमान है।
13.18 इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते
iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ | madbhakta etadvijñāya madbhāvāyopapadyate
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए। मेरा भक्त इसे जानकर मेरे भाव को प्राप्त होने योग्य बनता है।
13.19 प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi | vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisaṃbhavān
प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि जानो; और विकारों तथा गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जानो।
13.20 कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते
kāryakaraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate | puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate
कार्य, करण और कर्तापन में हेतु प्रकृति कही जाती है; सुख-दुःख के भोगने में हेतु पुरुष कहा जाता है।
13.21 पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु
puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān | kāraṇaṃ guṇasaṅgo'sya sadasadyonijanmasu
प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है; गुणों का संग ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।
13.22 उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः
upadraṣṭānumantā ca bhartā bhoktā maheśvaraḥ | paramātmeti cāpyukto dehe'sminpuruṣaḥ paraḥ
इस देह में स्थित परम पुरुष उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा गया है।
13.23 य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते
ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha | sarvathā vartamāno'pi na sa bhūyo'bhijāyate
जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को जानता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।
13.24 ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे
dhyānenātmani paśyanti kecidātmānamātmanā | anye sāṃkhyena yogena karmayogena cāpare
कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने भीतर आत्मा को आत्मा से देखते हैं, कुछ सांख्ययोग से, और कुछ कर्मयोग से।
13.25 अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः
anye tvevamajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate | te'pi cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ
दूसरे लोग, जो इस प्रकार नहीं जानते, दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं; वे सुने हुए के परायण लोग भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।
13.26 यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ
yāvatsaṃjāyate kiṃcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam | kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, जो भी स्थावर या जंगम प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जानो।
13.27 समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति
samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram | vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati
जो परमेश्वर को सब प्राणियों में समान रूप से स्थित, और नष्ट होने वालों में अविनाशी देखता है, वही वास्तव में देखता है।
13.28 समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्
samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram | na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim
सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को समान देखता हुआ वह अपने द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता, और इसी से परम गति पाता है।
13.29 प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ | yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati
जो देखता है कि सब कर्म सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हैं, और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही ठीक देखता है।
13.30 यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा
yadā bhūtapṛthagbhāvamekasthamanupaśyati | tata eva ca vistāraṃ brahma saṃpadyate tadā
जब वह प्राणियों के अलग-अलग भाव को एक में स्थित देखता है, और उसी से सबका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
13.31 अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते
anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ | śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate
हे कौन्तेय, अनादि और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहता हुआ भी न कुछ करता है, न लिप्त होता है।
13.32 यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते
yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate | sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate
जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने से लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।
13.33 यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत
yathā prakāśayatyekaḥ kṛtsnaṃ lokamimaṃ raviḥ | kṣetraṃ kṣetrī tathā kṛtsnaṃ prakāśayati bhārata
हे भारत, जैसे एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
13.34 क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्
kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā | bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param
जो ज्ञान-नेत्रों से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को, तथा प्राणियों के प्रकृति से छूटने को जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं।
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