स्थापना · 10 अप्रैल 1875

आर्य समाज की स्थापना

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की और हिन्दुओं को वेदों की ओर लौटने को कहा। इसके विद्यालय, शुद्धि का काम और इसके सदस्य इसे उत्तर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन तक ले गए।

तिथि: 10 अप्रैल 1875स्थान: गिरगाँव, बम्बईयुग: पुनर्जागरण और स्वराज का संघर्ष
चित्र: Srijut Krishnaravji · Public domain
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“आर्य समाज की स्थापना.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/ghatana/founding-of-arya-samaj/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). आर्य समाज की स्थापना. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/ghatana/founding-of-arya-samaj/

01वेदों की ओर

1824 में काठियावाड़ के टंकारा में मूलशंकर के नाम से जन्मे दयानन्द ने मथुरा में प्रज्ञाचक्षु वैयाकरण स्वामी विरजानन्द से अध्ययन किया था। स्थापना के वर्ष ही उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ प्रकाशित किया, जो समाज का प्रमुख ग्रन्थ बना। वे चारों वेदों को ईश्वर की वाणी मानते थे, और मूर्तिपूजा, जन्म के आधार पर किसी को वेद-अध्ययन से रोकने, बाल-विवाह तथा विधवा-विवाह पर रोक का खण्डन करते थे।

02बम्बई से लाहौर

समाज की स्थापना बम्बई के गिरगाँव में एक सभा में हुई। उसका सबसे बड़ा विस्तार पंजाब में हुआ, जहाँ 1877 में लाहौर में दयानन्द ने उसके दस नियम निर्धारित किए। 1883 में अजमेर में उनके देहावसान के बाद अनुयायियों ने 1886 में लाहौर में दयानन्द एंग्लो-वैदिक विद्यालय खोला, और स्वामी श्रद्धानन्द ने 1902 में हरिद्वार के पास कांगड़ी में गुरुकुल स्थापित किया। समाज ने हिन्दू धर्म छोड़ चुके लोगों को लौटाने के लिए शुद्धि का काम चलाया।

03स्वतन्त्रता आन्दोलन में

अंग्रेज़ी शासन से लड़ने वाले अनेक लोग आर्य समाज के घरों और विद्यालयों से निकले। लाला लाजपत राय आजीवन इसके सदस्य रहे और 1915 में इसका इतिहास लिखा। भगत सिंह आर्य समाजी परिवार में बड़े हुए और लाहौर के डी.ए.वी. विद्यालय में पढ़े। 1919 में दिल्ली में रॉलेट एक्ट के विरुद्ध जुलूस का नेतृत्व करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द की 1926 में हत्या कर दी गई। आज समाज सैकड़ों डी.ए.वी. विद्यालय और महाविद्यालय चलाता है।