कटक का घेरा (1749)

विजेताबंगाल का नवाबअलीवर्दी ख़ान
1749 ई.बनाम
नागपुर के भोंसलों की ओर से ओडिशा थामे सेनारघुजी भोंसले की ओर से मीर हबीब के अधीन सेनानायक

अलीवर्दी ख़ान ओडिशा के जंगलों से होकर भोंसले सेना से बाराबाटी दुर्ग छीनने आया। उसने दुर्ग जीता, और कुछ ही सप्ताह में फिर खो दिया।

तिथि: मई–जून 1749 ई.स्थान: बाराबाटी दुर्ग, कटक, ओडिशाप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Daniel Limma · CC BY-SA 3.0
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“कटक का घेरा (1749).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-cuttack-1749/. देखा गया .

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परिणाम

लगभग पखवाड़े बाद बाराबाटी ने अलीवर्दी के आगे समर्पण किया, पर उसके लौटते ही मराठों ने उसके नायब को घायल कर कटक वापस ले लिया।

01ओडिशा की ओर कूच

1745 में रघुजी भोंसले के सैनिकों द्वारा बाराबाटी लेने के बाद से ओडिशा मराठों के हाथ था। मार्च 1749 में अलीवर्दी उसे लौटाने मुर्शिदाबाद से निकला। तोपचियों के विद्रोह ने उसे बर्दवान में रोका, पर मिदनापुर पहुँचते ही मराठा सेनापति मीर हबीब पीछे हट गया। अलीवर्दी बालासोर से होकर, भद्रक और जाजपुर के पास वैतरणी पार करके, मई के मध्य में मुख्य सेना से आगे एक छोटी टुकड़ी के साथ कटक आ पहुँचा।

02जीता और खोया दुर्ग

बाराबाटी की सेना ने पहले शर्तें रखीं, फिर अड़ गई। अलीवर्दी ने दीवारों के सामने डेरा डाला और लगभग पंद्रह दिन बाद दुर्ग ने समर्पण किया। वर्षा निकट थी और वह बरसात भर सेना को ओडिशा में नहीं रखना चाहता था। उसने अब्दुस सुभान ख़ान को नायब सूबेदार बनाया और लौट पड़ा। वह बालासोर ही पहुँचा था कि ख़बर आई: मराठे लौट आए हैं, अब्दुस सुभान घायल है और कटक फिर उनके हाथ है।

नागपुर के भोंसले
राजवंश · लगभग 1739–1853 ई.नागपुर के भोंसलेछत्रपतियों के कुल के सम्बन्धी रघुजी भोंसले को शाहू ने बरार भेजा, और उन्होंने नागपुर को मध्य भारत के सबसे बड़े मराठा राज्य की राजधानी बनाया। उनकी सेनाओं ने बंगाल के नवाब से ओडिशा लिया, और यह घराना 1853 में अंग्रेज़ों के नागपुर हड़पने तक राज करता रहा।पढ़ें →
महत्त्व

यह ओडिशा पर अलीवर्दी का अंतिम गंभीर प्रयास था; दो वर्ष बाद उसने संधि द्वारा यह प्रांत भोंसलों को सौंप दिया।