अहमदनगर का घेरा (1803)

विजेताईस्ट इंडिया कंपनीमेजर-जनरल आर्थर वेलेज़्ली
1803 ई.बनाम
दौलतराव सिंधिया की क़िला-सेनासिंधिया का क़िलेदार

दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का पहला प्रहार। वेलेज़्ली ने चार दिनों में सिंधिया का अहमदनगर क़िला ले लिया और उसे दक्कन अभियान का आधार बनाया।

तिथि: 8–12 अगस्त 1803 ई.स्थान: अहमदनगर क़िला, महाराष्ट्रप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Kshitiz Sikka · CC BY-SA 4.0
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“अहमदनगर का घेरा (1803).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-ahmednagar-1803/. देखा गया .

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परिणाम

8 अगस्त को सीढ़ियों से नगर पर क़ब्ज़ा हुआ और दीवार में दरार पड़ने के बाद 12 अगस्त को क़िले ने समर्पण किया।

01युद्ध की घोषणा

सिंधिया और नागपुर के रघुजी भोसले ने बसई की संधि मानने से इनकार किया, जिसके द्वारा पेशवा ने स्वयं को अंग्रेज़ी संरक्षण में दे दिया था। 3 अगस्त 1803 को वार्ता टूट गई। पेशवा को पुणे में फिर बिठाने वाली सेना के साथ पहले से मैदान में उपस्थित वेलेज़्ली ने अहमदनगर पर कूच किया, निज़ामशाही काल का वह विशाल क़िला जो तब सिंधिया के पास था। यह सिंधिया का सबसे निकट का गढ़ था, और वेलेज़्ली वर्षा थमने और नदियाँ उतरने से पहले इसे ले लेना चाहता था।

02चार दिन

8 अगस्त को वेलेज़्ली की पैदल सेना सीढ़ियाँ लगाकर क़िले के पास के परकोटे वाले नगर, पेठ, की दीवार पर चढ़ी और गलियों में तीखी लड़ाई के बाद उसे ले लिया। फिर स्वयं क़िले के सामने तोपख़ाने लगाए गए। तोपों से दरार पड़ते ही क़िलेदार ने शर्तें माँगीं और 12 अगस्त को बाहर निकल आया। अब गोदावरी के मार्ग पर रसद-भंडार सहित एक मज़बूत ठिकाना कंपनी के हाथ था।

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युद्ध · 23 सितंबर 1803 ई.असई का युद्धदूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध की पहली बड़ी लड़ाई। सिंधिया की यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित पैदल सेना और तोपख़ाने ने कंपनी से कड़ा मुक़ाबला किया, और हारे।पढ़ें →
महत्त्व

अहमदनगर से वेलेज़्ली उत्तर बढ़ा और छह सप्ताह बाद असाये में सिंधिया और भोसले से भिड़ा।