01निज़ामशाहों से पेशवा तक
बहमनी सल्तनत से अलग होकर अहमद निज़ामशाह ने 1490 के दशक में सीना नदी के तट पर अपने नाम का नगर बसाया। उसके पोते हुसैन निज़ामशाह ने लगभग 1560 में किले को पत्थर की दीवारें और चौड़ी खाई दी। 1595–96 में चाँद बीबी ने मुग़ल शहज़ादे मुराद के विरुद्ध इसे बचाया, पर 1600 में किला अकबर की सेना के हाथ गया। शिवाजी के पिता शहाजी भोसले ने वर्षों तक अन्तिम निज़ामशाही राजकुमारों को सहारा दिया, जब तक 1636 में अहमदनगर अन्ततः न छिन गया। 1759 में मराठों ने किला लिया, और 1797 में इसके तत्कालीन स्वामी दौलतराव सिन्धिया ने वृद्ध मन्त्री नाना फडणवीस को इसी के भीतर बन्दी रखा।
02कांग्रेस नेताओं का कारागार
12 अगस्त 1803 को आर्थर वेलेज़्ली ने सिन्धिया की सेना से किला लिया, और यह अंग्रेज़ों की सैनिक चौकी बना रहा। 9 अगस्त 1942 की सुबह, भारत छोड़ो प्रस्ताव के अगले दिन, कांग्रेस कार्यसमिति बम्बई में बन्दी बनाकर यहाँ लाई गई: जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद, गोविन्द बल्लभ पन्त, आचार्य नरेन्द्र देव और अन्य। उन्हें लगभग तीन वर्ष यहाँ रखा गया। नेहरू ने 1944 के पाँच महीनों में अपनी कोठरी में ‘भारत की खोज’ लिखी। किला आज भी सेना की छावनी में है, और नेताओं के कक्ष दर्शकों को दिखाए जाते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1490 का दशकअहमद निज़ामशाह अहमदनगर और उसका पहला किला बसाता है।
- 1559–62हुसैन निज़ामशाह खाई सहित किले को पत्थर से फिर बनवाता है।
- 16001595–96 में चाँद बीबी के प्रतिरोध के बाद किला अकबर की सेना के हाथ जाता है।
- 1759मराठे अहमदनगर का किला लेते हैं।
- 1797दौलतराव सिन्धिया नाना फडणवीस को यहाँ बन्दी रखता है; अगले वर्ष वे छूटते हैं।
- 12 अगस्त 1803दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में आर्थर वेलेज़्ली किला जीतता है।
- 1942–45कांग्रेस कार्यसमिति यहाँ बन्दी रहती है; नेहरू ‘भारत की खोज’ लिखते हैं।
किला अहमदनगर (अहिल्यानगर) के पूर्व में छावनी के भीतर है; निर्धारित समय पर पहचान-पत्र दिखाकर प्रवेश मिलता है।





