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“कालिंजर का घेरा (1202).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/kalinjar-1202/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). कालिंजर का घेरा (1202). प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/battles/kalinjar-1202/
पानी समाप्त होने पर दुर्ग ने समर्पण किया; ग़ोरियों ने महोबा भी ले लिया।
01नीलकंठ की पहाड़ी
कालिंजर विंध्य की एक समतल चोटी वाली पहाड़ी पर है, चारों ओर खड़ी चट्टानें, और पश्चिमी ढलान में महादेव का नीलकंठ मंदिर कटा हुआ है। यह खजुराहो बनाने वाले चंदेलों का सबसे दृढ़ स्थान था। आल्हा-ऊदल की गाथाओं के परमाल, यानी परमर्दि, 1182 में ही पृथ्वीराज चौहान के हाथ महोबा खो चुके थे। बीस वर्ष बाद उनके सामने इससे कठोर शत्रु था।
02हसन निज़ामी के शब्दों में घेरा
‘ताज-उल-मआसिर’ के दरबारी इतिहासकार हसन निज़ामी लिखते हैं कि परमर्दि दुर्ग में घिर गए, अधीनता और कर देना स्वीकार किया, पर दुर्ग सौंपने से पहले ही चल बसे। उनके मंत्री अजयदेव ने शर्तें ठुकरा दीं और लड़ते रहे। ग़ोरियों ने सारे रास्ते घेर रखे थे। अंत में गर्मी में पहाड़ी के जलकुंड सूख गए और रक्षक नीचे उतर आए। इतिहासकार लिखता है कि कालिंजर के मंदिर मस्जिदों में बदल दिए गए। बुंदेलखंड की परंपरा परमर्दि के अंत को दूसरी तरह याद करती है, और दोनों वृत्तांत पूरी तरह मेल नहीं खाते।

03फिर वापस
दिल्ली की सेना कालिंजर को अधिक समय न रख सकी। परमर्दि के पुत्र त्रैलोक्यवर्मन ने दुर्ग फिर जीत लिया, और चंदेल अभिलेख बताते हैं कि तेरहवीं शताब्दी भर यह वंश वहीं से राज करता रहा। यह दुर्ग अंततः 1545 में शेरशाह के हाथ गया, जो उसी की दीवारों के नीचे मारा गया। पहाड़ी की ढलान पर नीलकंठ का मंदिर आज भी, विशेषकर शिवरात्रि पर, श्रद्धालुओं से भरता है।
इस पराजय ने बुंदेलखंड को दिल्ली की नई सत्ता के लिए खोल दिया, पर चंदेलों की वापसी ने दिखाया कि यह पहाड़ी प्रदेश रख पाना कितना कठिन था।




