लौटती हुई आक्रमणकारी सेना काट डाली गई और गिने-चुने घुड़सवार ही बंगाल लौट सके।
01तिब्बत की ओर कूच
मिन्हाज-उस-सिराज ने एक पीढ़ी बाद दिल्ली में लिखा कि बख़्तियार लगभग दस हज़ार घुड़सवार लेकर निकला। उसने एक बड़ी नदी को कई मेहराबों वाले पुराने पत्थर के पुल से पार किया, पुल पर पहरा छोड़ा और पहाड़ों में घुस गया। पहाड़ी लोगों और दर्रों के रक्षकों ने उसकी सेना को थका डाला। जब वह लौटा, तब तक पुल तोड़ा जा चुका था। सैनिकों ने नदी तैरकर पार करनी चाही और बड़ी संख्या में डूब गए। मिन्हाज के अनुसार लगभग सौ ही बचे। बख़्तियार टूटे मन से बंगाल के देवकोट पहुँचा और थोड़े ही समय में वहीं मारा गया।
02चट्टान जो याद रखती है
उत्तर गुवाहाटी में कनाई बरशी बोआ नामक चट्टान पर संस्कृत की एक छोटी पंक्ति खुदी है। उसमें लिखा है कि शक 1127 में चैत्र की तेरहवीं तिथि को कामरूप में आए तुर्क नष्ट कर दिए गए। शक 1127 सन् 1205–06 ई. में पड़ता है, जो फ़ारसी वृत्तांत से मेल खाता है। आरम्भिक तुर्क सेनाओं पर विजय का ऐसा अभिलेख, जिसे जीतने वाले पक्ष ने स्वयं लिखवाया हो, बहुत कम स्थानों पर बचा है।

पूर्वोत्तर सल्तनत के हाथ नहीं आया; आगे की सदियों में दिल्ली की कोई सेना कामरूप या ब्रह्मपुत्र घाटी पर टिक न सकी।
