01दो श्रीनगर
कल्हण दो नगरों की बात करते हैं। पहला, श्रीनगरी, उनके अनुसार अशोक ने आज के पान्द्रेठन के पास बसाया था, जिसका नाम पुराणाधिष्ठान, अर्थात पुरानी राजधानी, से निकला है; वहाँ दसवीं शताब्दी का एक छोटा पाषाण शिव मन्दिर आज भी एक कुण्ड में खड़ा है। दूसरा प्रवरपुर था, जिसे प्रवरसेन द्वितीय ने वितस्ता के दाएँ तट पर हरि पर्वत के नीचे बसाया, और वही आज का श्रीनगर बना। नगर की अधिष्ठात्री शारिका देवी उसी पहाड़ी पर सिन्दूर लगी शिला के रूप में पूजी जाती हैं। दूसरी पहाड़ी पर, डल के ऊपर, शंकराचार्य मन्दिर है।
02सुल्तान, पण्डित और निर्वासन
कल्हण का इतिहास आगे लिखने वाले जोनराज बताते हैं कि सुल्तान सिकन्दर (1389–1413) ने कश्मीर के मन्दिर तोड़े और ब्राह्मणों पर धर्म बदलने या चले जाने का दबाव डाला; उसके पुत्र ज़ैनुल आबिदीन ने उन्हें लौटने दिया और कुछ मन्दिर फिर बनवाए। अकबर ने 1586 में कश्मीर जीता, अहमदशाह अब्दाली के अफ़ग़ानों ने 1752 में, और महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने 1819 में। 1846 की अमृतसर सन्धि से यह गुलाब सिंह डोगरा को मिला। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान से आए क़बायली हमलावर बारामूला तक पहुँचे; महाराजा हरि सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए और 27 अक्टूबर को भारतीय सेना श्रीनगर उतरी। जनवरी 1990 में नगर के अधिकतर कश्मीरी पण्डित धमकियों के बीच पलायन को विवश हुए, और कम ही लौटे।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग छठी शताब्दीप्रवरसेन द्वितीय प्रवरपुर, आज का श्रीनगर, बसाते हैं (राजतरंगिणी, तरंग 3)।
- 1389–1413सुल्तान सिकन्दर पूरे कश्मीर में मन्दिर तोड़ता है (जोनराज की राजतरंगिणी)।
- 1418–1470ज़ैनुल आबिदीन निर्वासित पण्डितों को लौटने और कुछ मन्दिरों के जीर्णोद्धार की अनुमति देता है।
- 1586अकबर कश्मीर को साम्राज्य में मिलाता है।
- 1752अहमदशाह अब्दाली के अफ़ग़ान कश्मीर लेते हैं।
- 1819रणजीत सिंह की सिख सेना कश्मीर जीतती है।
- 1846अमृतसर सन्धि: कश्मीर गुलाब सिंह डोगरा को मिलता है।
- 26–27 अक्टूबर 1947हरि सिंह भारत में विलय करते हैं; भारतीय सेना श्रीनगर उतरकर नगर को हमलावरों से बचाती है।
- जनवरी 1990घाटी से कश्मीरी पण्डितों का पलायन।
शारिका देवी के लिए हरि पर्वत और शंकराचार्य मन्दिर के लिए गोपाद्रि पहाड़ी चढ़ें। तुलमुल्ला में खीर भवानी 25 किमी दूर है।








