01रंग बदलता कुण्ड
गान्दरबल के दलदलों के बीच पुराने चिनारों के कुंज में सात कोनों वाला एक कुण्ड है, और उसमें श्वेत संगमरमर का छोटा मन्दिर। जल रंग बदलता है: गुलाबी, हरा, दूधिया, नीला। कश्मीरी पण्डित रंगों को संकेत मानते हैं; काला जल अशुभ चेतावनी माना जाता है, और बहुत से लोग याद करते हैं कि 1990 के पलायन से पहले के महीनों में जल काला पड़ गया था। भक्त कुण्ड में दूध और खीर अर्पित करते हैं और किनारे पर दीप जलाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने 1898 में यहाँ कई दिन देवी की उपासना में बिताए।
02ज्येष्ठ अष्टमी
बड़ा मेला ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को, मई या जून में, लगता है। 1990 से पूरे भारत में बिखरे पण्डित परिवार उस एक दिन लौटते हैं, बहुत से जम्मू से विशेष बसों में, और कुंज खीर की गन्ध और कश्मीरी भजनों से भर जाता है। जम्मू-कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह ने 1912 में कुण्ड में वर्तमान संगमरमर का मन्दिर बनवाया। उस दिन बहुत से भक्त रात कुंज में ही बिताते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1898 ई.स्वामी विवेकानन्द कुण्ड पर उपासना करते हैं।
- 1912 ई.महाराजा प्रताप सिंह कुण्ड में संगमरमर का मन्दिर बनवाते हैं।
तुलमुल गाँव, गान्दरबल, श्रीनगर से 25 किमी उत्तर-पूर्व।




