नरगुंद का घेरा (1778)

विजेतामैसूर राज्यहैदर अली
1778 ई.बनाम
नरगुंद की जागीर, मराठों के अधीनवेंकटराव भावे

नरगुंद का पहाड़ी क़िला भावे नाम के एक ब्राह्मण परिवार का था, जो उसे पेशवा के अधीन रखता था। 1778 में कृष्णा के दक्षिण का मराठा प्रदेश समेटते हुए हैदर अली ने इसे ले लिया।

तिथि: 1778 ई.स्थान: नरगुंद, गदग ज़िला, कर्नाटकप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Pragya Sharan · CC BY-SA 4.0
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“नरगुंद का घेरा (1778).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-nargund-1778/. देखा गया .

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परिणाम

नरगुंद हैदर के हाथ आया, जिसने वेंकटराव भावे को करद शासक के रूप में बने रहने दिया।

01क़िला और उसका स्वामी

नरगुंद गदग के उत्तर की काली मिट्टी के मैदान के ऊपर एक लंबी पथरीली पहाड़ी पर खड़ा है। भावे परिवार इसे पेशवाओं के अधीन एक छोटी जागीर के रूप में रखता था। सौंशी की पराजय के बाद इस क्षेत्र की मराठा सेनाएँ इसकी रक्षा न कर सकीं, और 1778 में हैदर की सेना क़िले तक आ पहुँची। वेंकटराव भावे कुछ समय डटे रहे, पर बँटे हुए पुणे से कोई सहायता न आने पर उन्होंने हथियार डाल दिए।

02मैसूर का करद

हैदर ने परिवार को नहीं हटाया। वेंकटराव ने मैसूर को वार्षिक कर देने की शर्त पर नरगुंद अपने पास रखा। पर उनकी निष्ठा पुणे के साथ रही, और हैदर की मृत्यु के बाद जब टीपू सुल्तान ने अधिक कर माँगा, तो वेंकटराव फिर मराठों की ओर मुड़ गए। इसी से 1785 में टीपू का नरगुंद पर दूसरा घेरा और मराठा-मैसूर युद्ध हुआ। भावे परिवार 1858 तक नरगुंद में रहा, जब उसके अंतिम शासक भास्करराव भावे ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह किया और उन्हें फाँसी दी गई।

महत्त्व

नरगुंद की विजय से मैसूर की सीमा कृष्णा की ओर बढ़ी और वह झगड़ा खड़ा हुआ जिससे 1785 का युद्ध शुरू हुआ।