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“ख़ैबर पर पराजय.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/khyber-repulse-1842/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). ख़ैबर पर पराजय. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/battles/khyber-repulse-1842/
वाइल्ड की ब्रिगेड जलालाबाद की ओर दर्रा पार न कर सकी और जमरूद लौट गई; ख़ैबर अप्रैल में पोलक ही खोल पाया।
01जलालाबाद का मार्ग
1841 की सर्दियों तक पहला आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध बिगड़ चुका था। जनवरी 1842 में एल्फ़िंस्टन की सेना काबुल से निकली और दर्रों में नष्ट हो गई, जबकि सेल की ब्रिगेड जलालाबाद में डटी रही। राहत पेशावर से ख़ैबर होकर ही जा सकती थी। ब्रिगेडियर वाइल्ड को चार देसी पलटनों के साथ आगे भेजा गया, पर उसके पास काम लायक़ तोपें और ढुलाई कम थी, और जिन सिख टुकड़ियों से सहायता की आशा थी वे आगे नहीं आईं।
02अली मस्जिद पर वापसी
वाइल्ड ने अपनी सेना का एक भाग अली मस्जिद का क़िला थामने भेजा और 19 जनवरी 1842 को शेष के साथ पीछे चलने का प्रयास किया। अफ़रीदी दर्रे के दोनों ओर की चट्टानों पर जमे थे। एक तोप-गाड़ी टूट गई, सिपाही ऐसी गोलीबारी में फँसे जिसका उत्तर वे न दे सके, और टुकड़ी जमरूद लौट आई। अली मस्जिद में बैठे सैनिकों को पानी की कमी से कुछ दिन बाद उसे छोड़ना पड़ा। 5 अप्रैल 1842 को पोलक के धावे तक दर्रा बंद रहा।
वाइल्ड की विफलता ने दिखाया कि भारी तोपों और पहाड़ी क़बीलों की सहमति के बिना ख़ैबर पार करना कितना कठिन था; यही पाठ अंग्रेज़ों को 1878 और 1897 में फिर मिला।


