मुलतान का युद्ध (1749)

विजेतामीर मन्नू की पंजाब सरकार, सिख घुड़सवारों के साथदीवान कौड़ा मल; जस्सा सिंह आहलूवालिया
1749 ई.बनाम
मुलतान का विद्रोही सूबेदारशाहनवाज़ ख़ान

लाहौर के हिंदू दीवान कौड़ा मल ने सिख घुड़सवारों को साथ लेकर विद्रोही मुलतान पर चढ़ाई की। इस संयुक्त जीत ने उसे मुलतान का सूबेदार बनाया और सिखों को लाहौर दरबार से कुछ समय की दुर्लभ सद्भावना दिलाई।

तिथि: सितंबर 1749 ई.स्थान: मुलतान का बाहरी भाग, पंजाब (अब पाकिस्तान में)प्रकार: युद्ध
चित्र: Pragya Sharan · CC BY-SA 4.0
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“मुलतान का युद्ध (1749).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/battle-of-multan-1749/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). मुलतान का युद्ध (1749). प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/battles/battle-of-multan-1749/

परिणाम

शाहनवाज़ ख़ान लड़ाई में मारा गया और मुलतान फिर मीर मन्नू के अधीन आ गया, जिसने कौड़ा मल को वहाँ का सूबेदार बनाया।

01दीवान और खालसा

लाहौर का पूर्व सूबेदार शाहनवाज़ ख़ान मुलतान पर क़ब्ज़ा कर पंजाब के मुग़ल सूबेदार मीर मन्नू की अवज्ञा कर रहा था। मन्नू ने अपने दीवान कौड़ा मल को भेजा, जो लाहौर का खत्री था और सिखों के प्रति अपनी उदारता के लिए जाना जाता था। सैनिक कम थे, इसलिए कौड़ा मल ने वेतन का वचन देकर दल खालसा से सहायता माँगी। जस्सा सिंह आहलूवालिया उसके साथ चले। कूच में शिविरों को ठंडा शरबत पिलाने के कारण सिख उसे ‘मिट्ठा मल’ कहकर याद करते थे।

02शाहनवाज़ का अंत

मुलतान के बाहर दोनों सेनाएँ भिड़ीं। शाहनवाज़ के सैनिकों ने कौड़ा मल को बुरी तरह दबाया और कुछ देर लगा कि दिन हाथ से निकल गया। तभी सिख बंदूक़चियों ने स्वयं शाहनवाज़ को गोली मार गिराया, और उस अफ़रा-तफ़री में उसकी सेना बिखर गई। मीर मन्नू ने कौड़ा मल को ‘महाराजा बहादुर’ की उपाधि और मुलतान की सूबेदारी दी। कौड़ा मल ने लाहौर में अपने प्रभाव से सूबेदार का हाथ सिखों पर उठने से रोके रखा, और यह राहत 1752 में उसकी मृत्यु तक बनी रही।

महत्त्व

यह युद्ध दुर्रानी आँधियों से पहले के वर्षों में लाहौर के एक हिंदू मंत्री और उभरती सिख मिसलों की अल्पकालिक साझेदारी को दिखाता है।