01प्रह्लाद का नगर
मुल्तान की परंपरा कहती है कि यह हिरण्यकशिपु का नगर कश्यपपुर था, जहाँ बालक प्रह्लाद हर यातना में हरि का नाम जपता रहा और जहाँ भगवान नृसिंह खंभे से प्रकट हुए। पुराने दुर्ग के टीले पर प्रह्लादपुरी मंदिर उसी कथा के बताए स्थान पर बना था, और मुल्तान के हिंदू वहीं होली मनाते थे। नगर का महान सूर्य मंदिर, जिसे साम्ब पुराण श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब से जोड़ता है, पूरे उपमहाद्वीप से तीर्थयात्रियों को खींचता था; 641 में ह्वेनसांग ने इसकी स्वर्ण प्रतिमा देखी।
02विजयें और लंबी वापसी
राजा दाहिर के पतन के बाद 713 में मुहम्मद बिन क़ासिम ने मुल्तान लिया, और तीन शताब्दी तक अरब अमीरों ने इस पर राज किया, सूर्य मंदिर को हिंदू राजाओं के विरुद्ध बंधक बनाकर रखते हुए। 1006 में महमूद ग़ज़नवी ने इस पर आक्रमण किया; हिंदूशाही राजा आनंदपाल ने उसे अपने राज्य से रास्ता देने से मना किया और इसके लिए हराए गए, और 1010 तक महमूद ने नगर अपने राज्य में मिला लिया। 1175 में ग़ोर के मुहम्मद ने इसे लिया। जून 1818 में महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने मिस्र दीवान चंद के नेतृत्व में दुर्ग पर धावा बोलकर उसे जीता, और 1848 में यहाँ दीवान मूलराज के विद्रोह से दूसरा आंग्ल–सिख युद्ध आरंभ हुआ। 1947 में मुल्तान के लगभग सभी हिंदू और सिख भारत चले आए। तब तक खंडहर बन चुका प्रह्लादपुरी मंदिर दिसंबर 1992 में ढहा दिया गया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 641ह्वेनसांग मुल्तान में स्वर्ण सूर्य प्रतिमा देखते हैं।
- 713मुहम्मद बिन क़ासिम मुल्तान लेता है (चचनामा)।
- 1006आनंदपाल को हराकर महमूद ग़ज़नवी मुल्तान पर आक्रमण करता है।
- 1175ग़ोर का मुहम्मद मुल्तान लेता है।
- जून 1818रणजीत सिंह की सेना मुल्तान दुर्ग जीतती है।
- दिसंबर 1992प्रह्लादपुरी मंदिर ढहाया जाता है।






