कंदर्पी घाट की लड़ाई

विजेतादरभंगा राजमहाराजा नरेंद्र सिंह
1753 ई.बनाम
बंगाल के नवाब की सेनाभिखारी महथा, अलीवर्दी ख़ान की ओर से

जब अलीवर्दी ख़ान ने दरभंगा के मैथिल ब्राह्मण शासकों से कर माँगा, महाराजा नरेंद्र सिंह ने मना किया और नवाब की सेना का मैदान में सामना किया। मिथिला आज भी उस विजय के गीत गाती है।

तिथि: अक्टूबर 1753 ई.स्थान: कंदर्पी घाट, दरभंगा क्षेत्र, मिथिला, बिहारप्रकार: युद्ध
चित्र: Pragya Sharan · CC BY-SA 4.0
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“कंदर्पी घाट की लड़ाई.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/battle-of-kandarpi-ghat-1753/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). कंदर्पी घाट की लड़ाई. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/battles/battle-of-kandarpi-ghat-1753/

परिणाम

दरभंगा की सेना ने मिथिला से कर वसूलने भेजी नवाब की सेना को पीछे धकेल दिया।

01कर की माँग

दस वर्ष के मराठा धावों ने बंगाल का ख़ज़ाना ख़ाली कर दिया था, और अलीवर्दी ख़ान घाटा पूरा करने बिहार के ज़मींदारों की ओर मुड़ा। 1753 में उसने दरभंगा के खंडवाला कुल के महाराजा नरेंद्र सिंह से कर माँगा, जो मैथिल ब्राह्मण परिवार अधिकांश मिथिला का स्वामी था। नरेंद्र सिंह ने मना कर दिया। अलीवर्दी ने अपने अधिकारी भिखारी महथा को सेना देकर उसे झुकाने भेजा।

02घाट पर लड़ाई

अक्टूबर 1753 के आरंभ में कंदर्पी घाट पर दोनों सेनाएँ भिड़ीं। आरंभ में भिखारी महथा भारी पड़ा, पर दरभंगा के योद्धा सँभले और नवाब की सेना को मैदान से खदेड़ दिया। नरेंद्र सिंह ने माँगा गया कर दिए बिना अपनी भूमि बचाए रखी। यह लड़ाई ‘कंदर्पी घाट लड़ाई’ नाम के मैथिली गीत में अमर हो गई, जो उत्तर बिहार के गाँवों में आज भी याद किया जाता है।

महत्त्व

कंदर्पी घाट ने दरभंगा राज को मिथिला के प्रमुख हिंदू राजघराने के रूप में बनाए रखा, जो स्थान उसने 1947 तक सँभाला।