गौरीतृतीया

गणगौर

गण शिव हैं और गौर गौरी। होली के बाद अठारह दिन कन्याएँ और सुहागिनें ईसर और गणगौर की मिट्टी की प्रतिमाओं को पूजती हैं, कन्याएँ अच्छे वर के लिए, सुहागिनें अखण्ड सौभाग्य के लिए, और अन्तिम दिन देवी शोभायात्रा में सरोवर तक ले जाई जाती हैं।

मास: चैत्र शुक्ल तृतीया, होली के अगले दिन से आरम्भ अठारह दिनों की पूजा का समापनप्रायः: मार्च–अप्रैलऋतु: वसन्त ऋतुदेवता: माता पार्वती
चित्र: SpeakingArch · CC BY-SA 4.0
2 मिनट का पाठ WhatsApp
उद्धृत करें

MLA

“गणगौर.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/utsav/gangaur/. देखा गया .

APA

Hindu History. (2026). गणगौर. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/utsav/gangaur/

कैसे मनाते हैं

  1. 01

    अठारह दिनों तक ईसर और गौरी की मिट्टी की प्रतिमाओं की पूजा

  2. 02

    होली की राख वाले घड़ों में गेहूँ-जौ बोना

  3. 03

    सुबह के गीत और जल व दूब लाना

  4. 04

    अन्तिम दिन व्रत और सरोवर तक शोभायात्रा

  5. 05

    घेवर और मेहंदी

01गौरी का पीहर

यह पूजा शिव को पाने के लिए पार्वती के तप का और उनके पीहर लौटने का स्मरण है, जैसे बेटियाँ वसन्त में मायके आती हैं। होलिका दहन के अगली सुबह से स्त्रियाँ होली की राख इकट्ठी कर घड़ों में गेहूँ और जौ बोती हैं; ईसर और गौरी की मिट्टी की प्रतिमाएँ रँगी और सजाई जाती हैं। हर सुबह कन्याएँ गोर गोर गोमती गाती हुई ताज़ा जल, हरी दूब और फूल लाने निकलती हैं और प्रतिमाओं पर छिड़कती हैं। अन्तिम दो दिन स्त्रियाँ व्रत रखती हैं, और प्रतिमाओं को वैसी ही विदाई दी जाती है जैसी बेटी को ससुराल भेजते समय।

02राजसी नगरों की सवारियाँ

राजस्थान के दरबारों ने गणगौर को राज्योत्सव बना दिया, और जोधपुर व मेवाड़ शैली के चित्रों में महाराजा स्त्रियों को गौरी को जल तक ले जाते देखते दिखाए गए हैं। जयपुर में तृतीया और अगले दिन की संध्या को गणगौर की सवारी हाथियों, बैंडों और पालकियों के साथ सिटी पैलेस से निकलती है। उदयपुर में प्रतिमाएँ पिछोला झील के गणगौर घाट पर लाई जाती हैं और पानी पर नावें जगमगाती हैं।

कहाँ

सबसे अधिक राजस्थान; मध्य प्रदेश का मालवा, गुजरात; कोलकाता, असम और जहाँ भी बसे, वहाँ के मारवाड़ी परिवार

इसी मास में