अकाल · 1943–44

1943 का बंगाल अकाल

1943 में, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच, बंगाल में अकाल ने सरकारी जाँच की गिनती से लगभग 15 लाख और बाद के अनुमानों से लगभग 30 लाख लोगों के प्राण लिए। इसका कारण युद्ध-नीति, जमाख़ोरी और देर से जागी सरकार थी; फ़सल पूरी तरह विफल नहीं हुई थी।

तिथि: 1943–44स्थान: बंगालयुग: पुनर्जागरण और स्वराज का संघर्ष
चित्र: Unknown author · Public domain
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“1943 का बंगाल अकाल.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/ghatana/bengal-famine-1943/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). 1943 का बंगाल अकाल. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/ghatana/bengal-famine-1943/

01कैसे आया

1942 में जापान ने बर्मा ले लिया, जिससे वह चावल रुक गया जो बंगाल मँगाता था। आक्रमण के भय से अंग्रेज़ों ने तटीय बंगाल में ‘अस्वीकार नीति’ लागू की, चावल के भण्डार हटाए और हज़ारों देसी नावें ज़ब्त या नष्ट कीं जिन पर मछुआरों और व्यापारियों की जीविका थी। अक्टूबर 1942 में मिदनापुर में चक्रवात आया। युद्ध के ख़र्च से दाम चढ़े, और सेना तथा नगरों के लिए चावल ख़रीद लिया गया।

02कलकत्ता की सड़कें

1943 के मध्य तक गाँवों के लोग पैदल कलकत्ता आकर उसकी फ़ुटपाथों पर मरने लगे। सरकार ने अकाल घोषित नहीं किया। अगस्त 1943 में सम्पादक इयन स्टीफ़ेंस के समय ‘द स्टेट्समैन’ ने मरते लोगों के चित्र छापे, और ख़बर लन्दन पहुँची। रामकृष्ण मिशन, मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी और अन्य संस्थाओं ने लंगर चलाए। सेना ने राहत का काम शरद में नए वायसराय लॉर्ड वेवेल के समय ही सँभाला।

03गिनती और दोष

सर जॉन वुडहेड की अध्यक्षता वाले अकाल जाँच आयोग ने 1945 में बताया कि अकाल और रोग से लगभग 15 लाख लोग मरे। अमर्त्य सेन ने ‘पॉवर्टी एण्ड फ़ैमिन्स’ (1981) में संख्या लगभग 30 लाख बताई और दिखाया कि 1943 में बंगाल में अन्न पहले के वर्षों से बहुत कम नहीं था; दामों के सामने मज़दूरी ढह गई थी। मधुश्री मुखर्जी की ‘चर्चिल्स सीक्रेट वॉर’ (2010) ने मन्त्रिमण्डल के काग़ज़ों से दिखाया कि युद्ध मन्त्रिमण्डल ने भारत को अनाज भेजने के अनुरोध ठुकराए या घटाए।