मंगलौर का घेरा

विजेतामैसूर की सेनाटीपू सुल्तान
1784 ई.बनाम
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाकर्नल जॉन कैंपबेल

टीपू सुल्तान ने आठ महीने मंगलौर की कंपनी सेना को घेरे रखा। इसके समर्पण के बाद ऐसी संधि हुई जिसमें दोनों पक्षों ने जीती हुई भूमि लौटा दी।

तिथि: मई 1783 – 30 जनवरी 1784 ई.स्थान: मंगलौर दुर्ग, दक्षिण कन्नड़, कर्नाटकप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Unknown author · Public domain
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“मंगलौर का घेरा.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-mangalore-1784/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). मंगलौर का घेरा. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/battles/siege-of-mangalore-1784/

परिणाम

कैंपबेल ने शर्तों पर दुर्ग सौंप दिया; छह सप्ताह बाद मंगलौर की संधि से दूसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ।

01नेत्रावती का बंदरगाह

नेत्रावती और गुरुपुरा नदियों के मुहाने पर बसा मंगलौर टीपू के तट का प्रमुख बंदरगाह था। 1783 के आरंभ में बंबई से आई कंपनी की सेना ने इसे ले लिया। दिसंबर 1782 में हैदर अली की मृत्यु हो चुकी थी, और अब मैसूर के शासक टीपू ने पश्चिम की ओर कूच करके मई 1783 में दुर्ग को घेर लिया।

02आठ महीने

कर्नल जॉन कैंपबेल अंग्रेज़ और सिपाही सैनिकों की सेना के साथ पूरी वर्षा ऋतु डटे रहे। जब समाचार आया कि यूरोप में ब्रिटेन और फ़्रांस ने संधि कर ली है, तो युद्धविराम हुआ और टीपू के फ़्रांसीसी सहयोगी हट गए। पर मैसूर सेना ने दुर्ग को घेरे रखा, और रसद के जहाज़ पर्याप्त अन्न न उतार सके। रोग और भूख ने रक्षकों को तोड़ दिया। 30 जनवरी 1784 को कैंपबेल युद्ध-सम्मान के साथ बाहर निकले।

03मंगलौर की संधि

कंपनी के आयुक्त टीपू के डेरे में आए, और 11 मार्च 1784 को मंगलौर की संधि पर हस्ताक्षर हुए। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की जीती भूमि लौटा दी और बंदियों को छोड़ दिया। उसी वर्ष टीपू ने, यह मानकर कि कनारा के ईसाइयों ने कंपनी की सहायता की थी, मंगलौरी कैथोलिकों को श्रीरंगपट्टण ले जाने का आदेश दिया, जहाँ उनमें से बहुत-से 1799 तक बंदी रहे।

महत्त्व

इस घेरे के बाद हुई संधि उन अंतिम संधियों में थी जिनमें किसी भारतीय शासक ने कंपनी से बराबरी की शर्तों पर संधि की।