01केकय की राजकुमारी
कैकेयी उत्तर-पश्चिम के केकय देश के राजा अश्वपति की पुत्री और युधाजित की बहन थीं। तीन प्रमुख रानियों में वे दशरथ को सबसे प्रिय थीं। वाल्मीकि कहते हैं कि शम्बर के विरुद्ध युद्ध में राजा रण में गिर पड़े तो वे उन्हें रणभूमि से निकाल लाईं और प्राण बचाए। राजा ने उन्हें दो वर दिए। तब उन्होंने कुछ नहीं माँगा। उनके पुत्र भरत पुष्य नक्षत्र में जन्मे। राम के अभिषेक का समाचार पहली बार सुनकर वे प्रसन्न हुई थीं।
02मंथरा के साथ एक शाम
जब मंथरा समाचार लाई, कैकेयी ने उसे पुरस्कार में एक आभूषण दिया और कहा कि राम मुझे भरत जितने ही प्रिय हैं। मंथरा ने आभूषण फेंक दिया और बोलती रही: कौसल्या राजमाता होंगी, कैकेयी उनकी दासी, भरत निर्वासित या मृत। धीरे-धीरे उसने उन्हें बदल दिया। उसने दोनों वरों की याद दिलाई और कहा कि कोपभवन में जाओ, आभूषण उतारकर नंगी धरती पर लेटो और राजा की प्रतीक्षा करो। कैकेयी ने वैसा ही किया, और भरत का अभिषेक और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा।
03वरों का मूल्य
एक सप्ताह में उन्होंने सब जीता और सब खो दिया। पति उन्हें शाप देते हुए मरे। जब उन्होंने सीता को वल्कल दिए, वसिष्ठ ने सभा के सामने उन्हें फटकारा। उनके अपने पुत्र ने उन्हें हत्यारिन कहा और सिंहासन नहीं लिया। वे भरत के साथ चित्रकूट गईं, और वहाँ राम ने भरत से कहा कि अपनी माता को दोष मत दो। युद्ध के बाद राम ने दशरथ से उन पर दिया शाप वापस लेने को कहा, और दशरथ ने वापस ले लिया।
अध्यात्म रामायण और रामचरितमानस जोड़ते हैं कि देवताओं ने सरस्वती को मंथरा की बुद्धि फेरने भेजा, ताकि राम वन और रावण तक पहुँचें। यह व्याख्या इन बाद की कथाओं की है।
