जमरूद का युद्ध

विजेतासिख ख़ालसा सेनाहरि सिंह नलवा
1837 ई.बनाम
पक्षकाबुल की अफ़गान सेनादोस्त मोहम्मद ख़ान का पुत्र मोहम्मद अकबर ख़ान

दोस्त मोहम्मद ख़ान ने पेशावर वापस लेने के लिए अपनी सेना ख़ैबर से नीचे भेजी; सीमांत के सिख सूबेदार हरि सिंह नलवा घिरे हुए जमरूद किले की मदद को पेशावर से निकले और वहीं वीरगति पाई।

तिथि: 30 अप्रैल 1837 ई.स्थान: जमरूद, ख़ैबर दर्रे के मुहाने परप्रकार: युद्ध
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain
परिणाम

जमरूद और पेशावर सिख साम्राज्य के पास रहे, पर हरि सिंह नलवा को घातक घाव लगे।

01दर्रे पर किला

हरि सिंह नलवा ने 1836 में ख़ैबर के पूर्वी छोर को थामने के लिए जमरूद का किला बनवाया था, वही मार्ग जिससे सदियों तक पश्चिम के आक्रमणकारी पंजाब में उतरते आए थे। अप्रैल 1837 में, जब ख़ालसा सेना का बड़ा भाग राजकुमार नौनिहाल सिंह के विवाह के लिए लाहौर में था, अकबर ख़ान के नेतृत्व में अफ़गान सेना ने उसे घेर लिया। महान सिंह के अधीन छोटी चौकी डटी रही। पेशावर में बीमार पड़े नलवा जितनी सेना थी, उसे लेकर निकल पड़े।

0230 अप्रैल

30 अप्रैल 1837 को नलवा की सेना घेरने वालों पर टूट पड़ी। लड़ाई में उन्हें गोली लगी और उसी दिन घावों से उनका देहांत हुआ। उनके सरदारों ने उनकी मृत्यु छिपाए रखी ताकि चौकी और सैनिकों का मनोबल न टूटे, और लाहौर से सहायता आने तक किला टिका रहा। अफ़गान दर्रे में पीछे हट गए। पेशावर महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य में बना रहा, और 1849 में अंग्रेज़ों के आने तक ख़ैबर पंजाब की सीमा रहा।

महाराजा रणजीत सिंह
व्यक्तित्व · 1780–1839 ई.; महाराजा 1801–1839महाराजा रणजीत सिंहबचपन में चेचक से एक आँख गँवाने वाले एक मिसल-सरदार के पुत्र रणजीत सिंह ने 1799 में लाहौर लिया और पंजाब, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर को एक राज्य में जोड़ा। उन्होंने हरमंदिर साहिब को सोने की परत वाले ताँबे से मढ़वाया और चालीस वर्ष तक ख़ैबर पर अफ़ग़ानों को रोके रखा।पढ़ें →
महत्त्व

जमरूद हरि सिंह नलवा का अंतिम बड़ा मोर्चा था, जिन्होंने सदियों बाद पहली बार उत्तर-पश्चिमी सीमा पर धारा पलटी और ख़ैबर को पंजाब की सत्ता के लिए थामा।