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शासक

यशवंतराव होलकर

कंपनी से अकेले लड़ने वाले होलकर शासक

1776 ई.—1811 ई.

3 दिसंबर 1776 – 28 अक्टूबर 1811

तुकोजी होलकर के पुत्र यशवंतराव लड़-भिड़कर होलकर घराने के प्रमुख बने, 1802 में पुणे में पेशवा और शिंदे की संयुक्त सेना को हराया, और फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से टक्कर ली। 1804 में उन्होंने मॉन्सन की सेना को तहस-नहस किया और 1805 में अंग्रेज़ों के चार धावों के विरुद्ध भरतपुर बचाने में साथ दिया।

01आपस में उलझा घराना

यशवंतराव का जन्म 3 दिसंबर 1776 को अहिल्याबाई के सेनापति तुकोजी होलकर के पुत्र के रूप में हुआ। 1797 में तुकोजी का देहांत हुआ तो उत्तराधिकार बिखर गया। दौलतराव शिंदे ने एक भाई का पक्ष लिया और दूसरे भाई मल्हारराव को मरवा दिया। यशवंतराव भागे, घुड़सवारों और पिंडारियों का दल जुटाया, और तलवार के बल पर होलकर प्रदेश वापस लिया। अप्रैल 1801 में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने उनके भाई विठोजी को पुणे में हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। यशवंतराव राजधानी की ओर बढ़े।

02पुणे, 1802

25 अक्टूबर 1802, दीपावली के दिन, पुणे के बाहर हडपसर में उन्होंने पेशवा और शिंदे की संयुक्त सेना को परास्त किया। बाजीराव द्वितीय तट की ओर भागे और 31 दिसंबर 1802 को ईस्ट इंडिया कंपनी से बसई की संधि कर गद्दी के बदले अंग्रेज़ी सेना स्वीकार की। यशवंतराव ने युद्ध जीता, पर पेशवा अंग्रेज़ों के हाथ चले गए। 1803 में कंपनी का शिंदे और भोसले से युद्ध हुआ; उस वर्ष यशवंतराव अलग रहे, और दोनों हारे।

दिल्ली (इन्द्रप्रस्थ)
स्थान · पाण्डवों का इन्द्रप्रस्थ; लगभग 1052 में तोमर अनंगपाल का लालकोट; उसके बाद अनेक नगरदिल्ली (इन्द्रप्रस्थ)पाण्डवों का इन्द्रप्रस्थ यमुना-तट पर वहाँ था जहाँ आज पुराना क़िला है, और तोमरों तथा चौहानों ने महरौली में पहली परकोटे वाली दिल्ली बसाई। तब से इसी भूमि पर सात या अधिक नगर उठे।पढ़ें →

03कंपनी से अकेले

1804 में वे अकेले कंपनी से युद्ध में उतरे। होलकर प्रदेश में भीतर तक घुसी कर्नल मॉन्सन की सेना बरसात में फँसी और जुलाई-अगस्त में मुकुंदरा घाटी से आगरा की ओर पीछे खदेड़ी गई; उसके अधिकांश सैनिक और तोपें गईं। उसी अक्टूबर यशवंतराव ने दिल्ली घेरी पर ले न सके, और नवंबर में डीग में हारे और फ़र्रुख़ाबाद में अचानक घिरे। फिर वे भरतपुर के राजा रणजीत सिंह से मिले, और 1805 में भरतपुर की मिट्टी की प्राचीर पर लॉर्ड लेक के चारों धावे विफल रहे। साथी खोजते वे पंजाब गए और 24 दिसंबर 1805 को ब्यास तट पर राजघाट में संधि कर अपना अधिकांश प्रदेश वापस पाया। 28 अक्टूबर 1811 को भानपुरा में उनका देहांत हुआ।