आज भी खड़ा

लोहागढ़ दुर्ग, भरतपुर

जाट राजाओं का ‘लोहे का दुर्ग’, जिसके चारों ओर खाई और मिट्टी की मोटी प्राचीरें थीं जो तोप के गोले निगल जाती थीं। 1805 में इसने लॉर्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेज़ों के चार आक्रमण लौटा दिए, और 1826 में ही गिरा।

निर्माण: 1733 से, भरतपुर के महाराजा सूरजमलस्थान: राजस्थान (भरतपुर ज़िला)27.22° N, 77.49° E
  1. 1733
  2. जून 1761
  3. जनवरी–अप्रैल 1805
  4. 18 जनवरी 1826
चित्र: Bornav27may · CC BY-SA 3.0

01सूरजमल का दुर्ग

जाट शासकों में सबसे महान सूरजमल ने 1733 में भरतपुर को अपना केन्द्र बनाकर दुर्ग आरम्भ किया। उनके शिल्पियों ने चौड़ी खाई के पीछे भीतरी पाषाण दुर्ग बनाया, और दूसरी खाई के पीछे दबाई हुई मिट्टी की बाहरी प्राचीर, जिसे मोती झील से पानी मिलता था। गोले मिट्टी की दीवारों में धँस जाते, उन्हें तोड़ते नहीं। यहीं से सूरजमल ने जून 1761 में आगरे का क़िला लिया, उसी शीत में पानीपत से बचे मराठों को शरण और सहायता दी, और दिसम्बर 1763 में दिल्ली के पास मारे जाने तक यमुना से मेवात तक राज किया। उनके पुत्र जवाहर सिंह ने 1764–65 में दिल्ली पर धावा किया, और दुर्ग के भीतर जवाहर बुर्ज उसी अभियान का स्मारक है।

021805 और 1826

1804 में भरतपुर के महाराजा रणजीत सिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से युद्ध कर रहे यशवन्तराव होल्कर को शरण दी। जनवरी 1805 में लॉर्ड लेक ने घेरा डाला और जनवरी से फ़रवरी के बीच चार बार दीवारों पर धावा किया; हर धावा खाई में और मिट्टी की प्राचीर पर विफल हुआ, और अंग्रेज़ों की भारी हानि हुई। अप्रैल में रणजीत सिंह ने अपनी शर्तों पर सन्धि की और दुर्ग अपने पास रखा। फ़तेह बुर्ज उसी विजय के लिए बना। इक्कीस वर्ष बाद उत्तराधिकार के एक विवाद में लॉर्ड कॉम्बरमियर बड़ी सेना लाए, प्राचीरों के नीचे सुरंगें खोदीं और 18 जनवरी 1826 को भरतपुर पर धावा कर उसे ले लिया।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1733सूरजमल भरतपुर में दुर्ग आरम्भ करते हैं।
  2. जून 1761सूरजमल की सेना आगरे का क़िला लेती है।
  3. जनवरी–अप्रैल 1805लॉर्ड लेक के चार धावे विफल होते हैं; घेरा सन्धि पर समाप्त होता है।
  4. 18 जनवरी 1826प्राचीरों के नीचे सुरंगें लगाकर लॉर्ड कॉम्बरमियर दुर्ग पर अधिकार करते हैं।
दर्शन और यात्रा

भरतपुर नगर के बीच; सरकारी संग्रहालय भीतर कचहरी कलाँ में है। केवलादेव पक्षी विहार 3 किमी दूर है।