01मल्हारराव और अहिल्याबाई
जेजुरी के पास के एक गड़रिए के पुत्र मल्हारराव होलकर बाजीराव प्रथम के घुड़सवार सेनापतियों में ऊपर उठे, और 1730 के दशक में पेशवा ने उन्हें इन्दौर और मालवा का बड़ा भाग दिया। पुराने बाज़ार के बीच होलकरों का महल, राजवाड़ा, लगभग 1747 में आरम्भ हुआ। उनके पुत्र खण्डेराव 1754 में कुम्हेर में मारे गए, और 1766 में मल्हारराव तथा जल्द ही उनके पौत्र की मृत्यु के बाद खण्डेराव की विधवा अहिल्याबाई ने शासन सँभाला। वे नर्मदा तट के महेश्वर से राज करती रहीं, और उनके दान से पूरे भारत में मन्दिर और घाट बने या सँवरे: 1780 का वर्तमान काशी विश्वनाथ, खण्डित मन्दिर के बगल में सोमनाथ का एक मन्दिर, हरिद्वार और गया के घाट। इन्दौर के खजराना गणेश भी उन्हीं का कार्य माने जाते हैं।
02लूट, सन्धि और राजधानी
अक्टूबर 1801 में दौलतराव सिन्धिया की सेना ने सर्जेराव घाटगे के नेतृत्व में इन्दौर के बाहर यशवन्तराव होलकर को हराया और नगर को लूटा, राजवाड़ा जला दिया। यशवन्तराव सँभले और अगले वर्ष पुणे में पेशवा और सिन्धिया को हराया। दिसम्बर 1817 में महिदपुर में अंग्रेज़ों से होलकर सेना की हार के बाद जनवरी 1818 की मन्दसौर सन्धि ने राज्य को अंग्रेज़ों का सहयोगी बनाया, और राजधानी महेश्वर से इन्दौर आ गई। 1984 के दंगों में राजवाड़ा फिर जला और 2000 के दशक में उसका जीर्णोद्धार हुआ। होलकर इन्दौर 1948 में मध्य भारत में सम्मिलित हुआ।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1730 का दशकपेशवा मल्हारराव होलकर को इन्दौर और मालवा का बड़ा भाग देते हैं।
- लगभग 1747राजवाड़े का निर्माण आरम्भ।
- 1767अहिल्याबाई होलकर शासन सँभालती हैं और 1795 तक महेश्वर से राज करती हैं।
- अक्टूबर 1801सर्जेराव घाटगे के अधीन सिन्धिया की सेना इन्दौर लूटकर राजवाड़ा जलाती है।
- जनवरी 1818मन्दसौर सन्धि; इन्दौर होलकर राजधानी बनता है।
- 1948इन्दौर राज्य मध्य भारत में सम्मिलित।
- 1984दंगों में राजवाड़ा जलता है; 2000 के दशक में जीर्णोद्धार।
राजवाड़ा और होलकरों की कृष्णपुरा छतरियाँ पुराने नगर में हैं; खजराना गणेश पूर्व में है। अहिल्याबाई की राजधानी महेश्वर 90 किमी दक्षिण में है।







