भरतपुर की घेराबंदी

विजेताभरतपुर का जाट राज्यभरतपुर के महाराजा रणजीत सिंह
1805 ई.बनाम
पक्षईस्ट इंडिया कंपनीजनरल जेरार्ड लेक

चार महीने तक भरतपुर की मिट्टी की दीवारें जनरल लेक के सामने खड़ी रहीं, जिसने अभी-अभी उत्तर में मराठों को तोड़ा था। कंपनी के हज़ारों सैनिक मारे गए और दुर्ग नहीं लिया जा सका।

तिथि: जनवरी–अप्रैल 1805 ई.स्थान: लोहागढ़ दुर्ग, भरतपुर, राजस्थानप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Sainiikshank1410 · CC BY-SA 4.0
परिणाम

अंग्रेज़ों के चार धावे विफल रहे, और लेक ने राजा से संधि की; दुर्ग राजा के पास ही रहा।

01मिट्टी की दीवारें

लोहागढ़, यानी लोहे का दुर्ग, महाराजा सूरजमल ने बनवाया था, चौड़ी और गहरी खाई के पीछे कूटी हुई मिट्टी की मोटी प्राचीरों के साथ। तोप के गोले दीवारों को तोड़ने के बजाय उनमें धँस जाते थे। डीग के बाद भरतपुर के रणजीत सिंह ने यशवंतराव होलकर को शरण दी थी, और लेक उन्हें दंड देने आया। जनवरी से फ़रवरी 1805 के बीच उसने दरारों पर चार धावे भेजे। हर बार वे खाई और दीवारों से पीछे धकेल दिए गए।

02राजा की शर्तों पर संधि

लेक के लगभग तीन हज़ार सैनिक मारे गए या घायल हुए। अप्रैल 1805 में दोनों पक्षों ने संधि की: राजा ने हर्जाना दिया और होलकर से गठबंधन छोड़ा, और लेक लौट गया। अंग्रेज़ों से न जीता जा सका दुर्ग, भरतपुर की यह ख्याति बीस वर्ष रही, जब तक 1826 में लॉर्ड कॉम्बरमियर ने सुरंगें बिछाकर उस पर धावा नहीं बोला।

भरतपुर के जाट
राजवंश · 1722–1948 ई. (जाट प्रतिरोध 1669 से)भरतपुर के जाट1669 में गोकुला के नेतृत्व में ब्रज के जाट किसान मुग़लों के विरुद्ध उठे, और उसी लम्बे विद्रोह से बदनसिंह और उनके पुत्र सूरजमल ने डीग और भरतपुर को राजधानी बनाकर राज्य खड़ा किया। भरतपुर के मिट्टी की दीवारों वाले लोहागढ़ ने 1805 में अंग्रेज़ी सेना को चार बार लौटाया।पढ़ें →
महत्त्व

भरतपुर उत्तर में कंपनी की सबसे बड़ी रुकावट थी, और इसने दिखाया कि अच्छी दीवारों के पीछे उसकी सेनाएँ रोकी जा सकती हैं।