01मलबे में मन्दिर-नगर
प्रतिहार काल में यह ढलान देवालयों से भरी थी, अधिकतर नागर शिखर वाले छोटे चौकोर गर्भगृह, कुछ बड़े। किसी समय, सम्भवतः भूकम्प में, लगभग सब गिर गए। सदियों तक यह स्थल चम्बल के बीहड़ में तराशे पत्थरों का मैदान बना रहा। 19वीं शताब्दी में अलेक्ज़ेण्डर कनिंघम ने इसका उल्लेख किया, पर यह उस इलाक़े में था जहाँ कम लोग जाते थे: बीहड़ पर डाकुओं का राज था।
02हाथों से फिर खड़े
2005 से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के भोपाल मण्डल ने के.के. मुहम्मद के नेतृत्व में गिरे पत्थरों को छाँटना और मन्दिर-दर-मन्दिर पहेली की तरह वापस जोड़ना शुरू किया। यह काम तब इलाक़े पर काबिज़ डाकू निर्भय सिंह गुर्जर के गिरोह की मौन सहमति से चला। लगभग 80 मन्दिर फिर खड़े हैं। ढलान के ऊपर के बड़े शिव मन्दिरों से शिखरों की पंक्तियों पर सबसे अच्छी दृष्टि मिलती है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 8वीं–10वीं शताब्दीमन्दिरों का निर्माण।
- 2005 ई. सेभा.पु.स. ने पुनर्निर्माण आरम्भ किया; लगभग 80 मन्दिर फिर खड़े।
ग्वालियर से लगभग 35 कि.मी. उत्तर; मितावली और पढ़ावली के साथ एक दिन में देखिए।




