श्रीकृष्ण

स्याम मने चाकर राखो जी

मीराबाईमीराबाईलगभग 1498 – लगभग 1547 ई.

स्याम मने चाकर राखो जी।
गिरधारी लाला चाकर राखो जी॥

चाकर रहसूँ बाग लगासूँ नित उठ दरसण पासूँ।
ब्रिंदाबन की कुंजगलिन में तेरी लीला गासूँ॥

चाकरी में दरसण पाऊँ सुमिरण पाऊँ खरची।
भाव भगति जागीरी पाऊँ तीनूँ बाताँ सरसी॥

मोर मुकुट पीतांबर सोहै गल बैजंती माला।
ब्रिंदाबन में धेनु चरावे मोहन मुरलीवाला॥

हरे हरे नित बाग लगाऊँ बिच बिच राखूँ क्यारी।
साँवरिया के दरसण पाऊँ पहर कुसुम्मी सारी॥

जोगी आया जोग करणकूँ तप करणे संन्यासी।
हरी भजनकूँ साधू आया ब्रिंदाबन के बासी॥

मीरा के प्रभु गहिर गंभीरा सदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हें प्रेमनदी के तीरा॥

अर्थ

हे श्याम, मुझे अपनी दासी बनाकर रखो। हे गिरधारी लाला, मुझे अपनी सेवा में रखो।

दासी बनकर मैं बाग लगाऊँगी और रोज़ उठकर तुम्हारे दर्शन पाऊँगी। वृंदावन की कुंज-गलियों में तुम्हारी लीला गाऊँगी।

सेवा के बदले मुझे दर्शन मिलेंगे, खर्च के लिए स्मरण मिलेगा, और जागीर में भाव-भक्ति मिलेगी। तीनों ही सौदे अच्छे हैं।

मोर-मुकुट और पीतांबर शोभा देते हैं, गले में वैजयंती माला है; मुरली वाले मोहन वृंदावन में गाएँ चराते हैं।

मैं रोज़ हरे-भरे बाग लगाऊँगी, बीच-बीच में क्यारियाँ रखूँगी, और कुसुंबी साड़ी पहनकर साँवरिया के दर्शन करूँगी।

योगी योग करने आया, संन्यासी तप करने, और वृंदावन में रहने वाला साधु हरि-भजन करने आया।

मीरा के प्रभु गहरे और गंभीर हैं, हे मन, सदा धीरज रखो। आधी रात को प्रभु ने प्रेम की नदी के किनारे दर्शन दिए।

इस भजन के बारे में

एक रानी माली की नौकरी माँग रही है। मीरा सेवक की तरह शर्तें तय करती हैं: वेतन में दर्शन, जेब-खर्च में स्मरण, जागीर में भक्ति। फिर गीत वृंदावन और उसकी कुंज-गलियों में पहुँचता है, जहाँ परंपरा के अनुसार मीरा द्वारका जाने से पहले कुछ समय रहीं। अंतिम पंक्ति, प्रेम-नदी के तट पर आधी रात के दर्शन, उन गिने-चुने स्थानों में है जहाँ वे स्वयं मिलन की बात कहती हैं।

Meera padavali; text as on Kavita Kosh