श्रीकृष्ण

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो

मीराबाईमीराबाईलगभग 1498 – लगभग 1547 ई.

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥

जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥

सत की नाँव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस गायो॥

अर्थ

मैंने पा लिया, मैंने राम-नाम रूपी रत्न-धन पा लिया। मेरे सद्गुरु ने मुझे यह अनमोल वस्तु दी और कृपा करके मुझे अपना लिया।

मुझे जन्म-जन्म की पूँजी मिल गई, संसार का सब कुछ खो दिया। यह धन खर्च करने से घटता नहीं, चोर इसे लूट नहीं सकता, और दिन-दिन सवाया बढ़ता जाता है।

सत्य की नाव है और सद्गुरु खेवनहार हैं; मैं भवसागर पार कर आई। मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं, मैं हर्ष से भरकर उनका यश गाती हूँ।

इस भजन के बारे में

मीरा का यह गीत उस धन के मिलने का है जो कभी खो नहीं सकता। भाषा व्यापारी की है: जन्मों से जोड़ी पूँजी, हर दिन सवाया बढ़ता धन, जिसे कोई चोर नहीं ले जा सकता। वे यह देन अपने सद्गुरु को देती हैं, और इसी कारण गुरु पूर्णिमा की सभाओं में यह प्रायः गाया जाता है; परंपरा मीरा के गुरु के रूप में संत रैदास का नाम लेती है। यहाँ राम उन्हीं प्रभु का नाम है जिन्हें वे दूसरी जगह गिरधर कहती हैं, जैसा अंतिम पंक्ति दिखाती है।

Meera padavali; text as on Kavita Kosh