श्रीकृष्ण

पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे

मीराबाईमीराबाईलगभग 1498 – लगभग 1547 ई.

पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे॥

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे।
विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे॥

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

अर्थ

पैरों में घुँघरू बाँधकर मीरा नाची। मैं अपने आप अपने नारायण की दासी बन गई हूँ।

लोग कहते हैं मीरा बावली हो गई, बिरादरी कहती है उसने कुल का नाश कर दिया। राणा ने विष का प्याला भेजा, और मीरा हँसते-हँसते उसे पी गई।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं; वे अविनाशी उसे सहज ही मिल गए।

इस भजन के बारे में

यह वह पद है जिसने हर भारतीय के मन में मीरा का चित्र बना दिया: पैरों में घुँघरू बाँधे मंदिर में नाचती रानी, जिस पर दरबार हँसता है। यह भक्त-चरित्रों में कही गई उस कथा की ओर संकेत करता है कि मेवाड़ के राणा ने विष का प्याला भेजा, जो अमृत बन गया। मीरा यहाँ आलोचकों से बहस नहीं करतीं; वे बस उनकी बातें गिनाती हैं और नाचती रहती हैं। “रे” की टेक सबको साथ गाने बुलाती है, इसलिए कीर्तन मंडलियों में यह बहुत प्रिय है।

Meera padavali; text as on Kavita Kosh