मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई॥
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई।
छाँड़ि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई।
चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अँसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
Mere to Giridhar Gopal dusro na koi,
jake sir hai morpakha mero pati soi.
Tat mat bhrat bandhu apno na koi,
chhandi dai kul ki kani kaha karihai koi,
santan dhig baithi baithi loklaj khoi.
Chunari ke kiye tuk odh linhin loi,
moti munge utar banmala poi.
Ansuvan jal sinchi-sinchi prem-beli boi,
ab to bel phail gai anand phal hoi.
Dudh ki mathaniyan bade prem se biloi,
makhan jab kadhi liyo chhachh piye koi.
Bhagati dekhi raji hui jagat dekhi roi,
dasi Mira Lal Giridhar taro ab mohi.
अर्थ
मेरे तो गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोरपंख है, वही मेरे पति हैं।
पिता, माता, भाई, बंधु, कोई अपना नहीं। मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी है, अब कोई मेरा क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज खो दी।
चुनरी के टुकड़े कर दिए और कंबल ओढ़ लिया। मोती-मूँगे उतार दिए और वनफूलों की माला पिरो ली।
आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई। अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगे हैं।
मैंने बड़े प्रेम से दूध मथा; माखन मैंने निकाल लिया, अब छाछ जो चाहे पिए।
भक्ति देखकर मैं प्रसन्न हुई और संसार को देखकर रोई। दासी मीरा कहती है: हे प्यारे गिरधर, अब मुझे पार लगाओ।
इस भजन के बारे में
“मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई”: मीरा का पूरा जीवन इन्हीं शब्दों में है। मेड़ता की राजकुमारी, जो मेवाड़ के राजघराने में ब्याही गई, रेशमी चुनरी छोड़कर मोटी लोई ओढ़ती है, मोती छोड़कर वनमाला पहनती है, और ससुराल के विरोध के बीच साधुओं की संगति में बैठती है। दूध मथने का बिंब तीखा है: जीवन का माखन उन्होंने निकाल लिया, छाछ संसार के लिए छोड़ दी। यह पद सब जगह गाया जाता है, और कविता कोश इसे राग झिंझोटी में दर्ज करता है।
Meera padavali; text as on Kavita Kosh
