हरि तुम हरो जन की भीर।
द्रोपदी की लाज राखी तुम बढ़ायो चीर॥
भक्त कारण रूप नरहरि धरयो आप शरीर।
हिरणकश्यपु मार दीन्हों धरयो नाहिंन धीर॥
बूड़ते गजराज राखे कियो बाहर नीर।
दासि मीरा लाल गिरिधर दुख जहाँ तहँ पीर॥
Hari tum haro jan ki bhir,
Dropadi ki laj rakhi tum badhayo chir.
Bhakt karan roop Narahari dharyo ap sharir,
Hiranakashyapu mar dinhon dharyo nahinn dhir.
Budate gajaraj rakhe kiyo bahar nir,
dasi Mira Lal Giridhar dukh jahan tahan pir.
अर्थ
हे हरि, अपने भक्तों का संकट हर लीजिए। आपने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज रखी।
भक्त के लिए आपने स्वयं नरसिंह का शरीर धारण किया। हिरण्यकशिपु को मार डाला, आपसे धैर्य नहीं रखा गया।
डूबते गजराज की रक्षा की और उसे जल से बाहर निकाला। दासी मीरा कहती है: हे प्यारे गिरधर, जहाँ दुख है, वहीं आपको पीड़ा होती है।
इस भजन के बारे में
छह पंक्तियों में तीन कथाएँ: कौरव सभा में द्रौपदी का अनंत चीर, प्रह्लाद के लिए खंभे से प्रकट होते नृसिंह, और ग्राह से बचाया गया गजेंद्र। हर बार भगवान पुकार सुनते ही आए। मीरा इन्हें वैसे याद करती हैं जैसे कोई मित्र के पुराने उपकार याद करके एक और विनती करे। गांधी जी को यह पद प्रिय था, और उनके आश्रमों की प्रार्थना सभाओं में यह गाया जाता था।
Meera padavali; text as on Kavita Kosh
