माई मैनें गोविंद लीन्हो मोल॥
कोई कहे हलका कोई कहे भारी।
लियो है तराजू तोल॥
कोई कहे सस्ता कोई कहे महँगा।
कोई कहे अनमोल॥
ब्रिंदाबन के जो कुंजगलिन में।
लियो बजंता ढोल॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर।
पूरब जनम के बोल॥
Mai mainen Govind linho mol.
Koi kahe halka koi kahe bhari,
liyo hai taraju tol.
Koi kahe sasta koi kahe mahanga,
koi kahe anmol.
Brindaban ke jo kunjgalin mein,
liyo bajanta dhol.
Mira ke prabhu Giridhar Nagar,
purab janam ke bol.
अर्थ
माँ, मैंने गोविंद को मोल ले लिया।
कोई कहता है हल्का, कोई कहता है भारी; मैंने तराज़ू पर तौलकर लिया है।
कोई कहता है सस्ता, कोई कहता है महँगा, कोई कहता है अनमोल।
वृंदावन की कुंज-गलियों में मैंने उन्हें ढोल बजाकर, सबके सामने लिया है।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं; यह पिछले जन्म का वचन है।
इस भजन के बारे में
मीरा चित्तौड़ की कानाफूसी का उत्तर बाज़ार के गीत से देती हैं। लोग दाम पर बहस करते रहें; उन्होंने दाम चुका दिया है, माल स्वयं तौला है, और गोविंद को ढोल बजाकर सबके सामने खरीदा है, जैसे गाँव में पक्के सौदे की मुनादी होती है। अंतिम पंक्ति उस विश्वास को छूती है, जो उनके पदों में बार-बार आता है, कि वे पिछले जन्म में ब्रज की गोपी थीं। कविता कोश का पाठ इसे ध्रुवपद के रूप में दर्ज करता है, हर पंक्ति के बाद टेक के साथ।
Meera padavali; text as on Kavita Kosh
