श्रीकृष्ण

हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ

सूरदाससूरदासलगभग 1478 – लगभग 1580 ई.

हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुहारौ, सोई पार करौ॥

इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ॥

इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिलि गए तब एक-बरन ह्वै, सुरसरि नाम परौ॥

तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ।
कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ॥

अर्थ

हे मेरे प्रभु, मेरे अवगुणों को मन में मत रखिए। आपका नाम समदर्शी है, उसी नाम के नाते मुझे पार कीजिए।

एक लोहा पूजा में रखा जाता है और एक कसाई के घर पड़ा रहता है। पारस यह भेद नहीं जानता; वह दोनों को खरा सोना बना देता है।

एक धारा नदी कहलाती है और एक गंदे पानी से भरा नाला। जब दोनों गंगा में मिल जाते हैं तो एक रंग के हो जाते हैं और दोनों का नाम गंगा पड़ जाता है।

शरीर माया है और जीव ब्रह्म कहलाता है; सूर कहते हैं कि दोनों के मेल से जीव बिगड़ गया है। या तो इन्हें अलग कर दीजिए, नहीं तो पतितों को तारने का आपका प्रण टल जाएगा।

इस भजन के बारे में

यहाँ सूरदास अपने प्रभु से बहस करते हैं, बड़े प्रेम से और कुछ ढिठाई से। पारस यह नहीं पूछता कि किस लोहे को छू रहा है; गंगा यह नहीं पूछती कि कौन-सी धारा उसमें मिल रही है। यदि भगवान सचमुच समदर्शी हैं तो पापी का उद्धार भी उतना ही निश्चित होना चाहिए जितना संत का। प्रसिद्ध लोकप्रिय रूप “प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो”, जो मंचों पर गाया जाता है, इसी पद को थोड़े शब्द-भेद के साथ लेता है। कविता कोश बताता है कि अंतिम दो पंक्तियाँ यों भी मिलती हैं: “इक जीव इक ब्रह्म कहावत, सूर स्याम झगरौ; अबकी बेर मोहि पार कीजै, कै प्रन जात टरौ”।

Sursagar, vinaya padas; text as on Kavita Kosh (with the noted variant)